जल रही है जमीं जल रहा आसमाँ - श्री विमल कुमार" - Teachers of Bihar

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Monday, 7 November 2022

जल रही है जमीं जल रहा आसमाँ - श्री विमल कुमार"

आषाढ़ का महीना चल रहा है,सावन का पवित्र माह प्रारंभ होने मेें महज चंद दिन ही बाकी रह गई है। प्रचंड गर्मी जेठ,बैशाख की तरह गर्म लू का चलना,चारों ओर भीषण गर्मी का तांडव नृत्य आज सम्पूर्ण पर्यावरण को तबाही के कगार पर पहुँचाने में अहम भूमिका निभा रही है।पृथ्वी का तापमान 48 से 50 डिग्री सेल्सियस को पार कर रही है,नदियाँ सूख चुकी है,तालाब खेल के मैदान में तब्दील हो चुके हैं,नदियों से लगातार अवैध बालू के उठाव ने नदियों को लगभग मृतप्राय सा बना दिया है।खेतों में लगे धान के बीचड़े जल कर अपने भूमि के मालिक को कोश रहे हैं कि आज मेरी जो ये हालात है,वह बस तूने और सिर्फ तूने बनायी है।तुम जैसे समाज के लोगों ने अपना विकास करने के लिये इस पर्यावरण का भरपूर दोहन किया है,इसलिए यह पर्यावरण इस सृष्टि के जीवों को समूल नष्ट करके ही चैन लेगी।चाहे सरकार की नीति हो या अवैध ढ़ंग से पोलीथीन की फैक्ट्री चलाने वाले लोगों ने सरकारी पदाधिकारियों को अपने नियंत्रण में लेकर जो पोलीथीन का उत्पादन किया है,जिसका खामियाजा बेचारी, लाचार धरती माता को भुगतना ही पड़ेगा।पोलीथीन जो कि इस धरती का कोड़ बन चुका है,वह एक विकराल चुनौती बनकर हमारी कृषि व्यवस्था को गर्त में ले जाने के लिये काफी है।एक आम कहावत है कि "जल ही जीवन है,जल नहीं तो कल नहीं"जो कि आने वाली पीढ़ी को भुगतना ही पड़ेगा।

इसी संदर्भ में पर्यावरण के एक जाने माने शुभ चिंतक और बाँका वन प्रमंडल के वरीय पदाधिकारी श्री अभिषेक कुमार सिंह का मानना है कि आने वाले चालीस वर्ष में तो लगता है कि लोगों को पीने का पानी भी नहीं मिल पायेगा।लगातार शहर तथा सड़क किनारे घर बनाना तथा गाँव से रोजगार की तलाश में लोगों के शहर की ओर पलायन ने तो मानो प्राकृतिक संतुलन को अस्त-व्यस्त करने में अहम भूमिका निभाई है।

विकास के नाम पर अंधाधुंध वृक्षों की कटाई तथा लगातार कंक्रीट के जंगल बनाये जाने के चलते वर्षा जल के संरक्षण पर ग्रहण लगता जा रहा है। एक ओर वर्षा के जल का धरती के अंदर प्रवेश पर रोड़ा बनता हुआ कंक्रीट का जंगल तो दूसरी ओर मिनरल वाटर तथा जार वाले फिल्टर पानी के पीने की आदत ने लगभग 86%जल को बेकार बनाकर हम लोगों को एक दूसरे से आगे बढ़ने की सीढ़ी पर लाकर खड़ा कर दिया है, जिसके लिये इस आलेख के लेखक भी कसूरवार है।

आज के वर्तमान समय की दुर्दशा जिसे देखकर,महसूस कर हर व्यक्ति आज तबाही के कगार पर है कि"तेरा क्या होगा रे जन-मानस,तूने जिस प्रकार से पृथ्वी के वक्षस्थल को तेज धार वाले हथियार से अंग-भंग कर डाला है,अब मेरी बारी है,तेरा और तेरे पर्यावरण का तो वो हश्र कर दूँगा कि"तू गर्मी से चीखता रहेगा, पानी- पानी,ऑक्सीजन-ऑक्सीजन मांगता रहेगा और तुम्हारी मौत तुम्हारी जिन्दगी को गर्मी,धूप,बरसात,ठंड से तड़पा-तड़पा कर तेरा हिसाब चुकता कर लेगी"।अभी तो तुम्हारी फसलें जल रही है,पृथ्वी के हर जीव जल, जीवन और हरियाली के लिये तड़प रहे हैं।अभी भी तुमने यदि पर्यावरण का दोहन करना न बंद किया तो जब पृथ्वी का तापमान 60 डिग्री सेल्सियस हो जायेंगे तो आपके चमड़े  झुलसने लगेंगे,जिसे पर्यावरण विज्ञान चमड़े का कैंसर कहता है।इसलिए अभी भी आपलोगों के पास वक्त है कि "जल,जीवन और हरियाली"को बचाने का प्रयास कीजिए।

पर्यावरण,वन एवं जलवायु परिवर्तन विभाग  भारत सरकार के साथ-साथ सभी जिलों में स्थापित"वन प्रमंडल कार्यालय एवं उसके पदाधिकारी तथा अन्य कर्मी आप सभी लोगों का आपके एक प्रमुख कार्यक्रम "वन-महोत्सव"जिसका एक प्रमुख स्लोगन है"वृक्ष का अर्थ है जल और जल का अर्थ है रोटी"जैसे कार्यक्रम में हार्दिक स्वागत करती है।

आइये हम सभी मिलकर अधिक-से-अधिक वृक्षारोपण करके अपना और अपने आने वाले भविष्य को संवारने का प्रयास करें।


श्री विमल कुमार"विनोद"शिक्षक सह

पर्यावरणविद की लेखनी से

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