श्री विमल कुमार 'विनोद 'शिक्षक की लेखनी से।
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मनुष्य के जन्म लेने के बाद से ही उसको माता-पिता,समाज,परिवेश विद्यालय तथा शिक्षक से शिक्षा प्राप्त होने लगती है।शिक्षा किसी भी व्यक्ति के जीवन के विकास के लिये आवश्यक है।इसके बिना किसी भी व्यक्ति के जीवन में किसी प्रकार का परिवर्तन ला पाना असंभव है। विश्व में जितनी भी तरह की समस्या है उसकी जननी अशिक्षा ही है।इस पृथ्वी पर समस्याओं के समाधान के लिये तथा मनुष्यों के विकास के लिये बचपन से ही उनको तरह-तरह के ज्ञान तथा जानकारी की आवश्यकता है जिसकी पूर्ति जन्म के बाद से उसके माता-पिता ,परिवार,समाज विद्यालय तथा शिक्षक के द्वारा दिया जाता है। इसके बिना लोगों का जीवन पतवार विहीन नाव के समान है जहाँ पर कोई भी व्यक्ति चरित्रहीन,अज्ञानी,मूढ़,पतित,पशुतुल्य बन जाता है।
आज पाँच सितंबर जो कि डाॅक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन के जन्म दिन पर पूरे देश में" शिक्षक दिवस"के रूप में मनाया जाता है,जिनका कहना था कि शिक्षा जीवनदायिनी होती है। वह हमारे आत्मिक जड़त्व को खत्म करती है तथा आत्म नियंत्रण करना सिखाती है। आगे डाॅक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने शिक्षक को उच्च स्थान प्रदान किया है। उनका मानना है कि अध्यापक को श्रेष्ठ गुणों से युक्त होना चाहिये।अध्यापक को पुस्तकीय ज्ञान तथा परीक्षा परिणाम में अधिक बल न देकर छात्रों को नैतिक ज्ञान देना चाहिए।उनका कहना था कि शिक्षक को जन सेवक के रूप में अपनी सेवा देनी चाहिये, जिससे छात्रों के भीतर स्वस्थ हृदय एवं मस्तिष्क का निर्माण हो सके।
डाॅक्टर राधाकृष्णन ने अपने दर्शन में शिक्षक को महत्वपूर्ण माना है परन्तु इसके साथ वे छात्र की सत्ता पर भी विश्वास करते हैं। उनके अनुसार छात्रों में योग्यता ,रूचि एवं अभिवृत्तियों से संबंधित व्यक्तिगत भिन्नता पायी जाती है। अध्यापक को चाहिये कि वह इन भिन्नताओं को पहचान कर छात्रों का अधिकतम विकास करने वाली श्रेष्ठ शिक्षण व्यवस्था का चयन करे। चूँकि शिक्षा सभी समस्याओं के समाधान तथा विकास की जननी मानी जाती है इसलिए इसको देने वाले शिक्षकों को भी सम्मान दिया जाना आवश्यक है ,जिसकी कमी आज के समय में देखने को मिलती है, जो कि आने वाले समय में शिक्षा के गुणवत्तापूर्ण होने के राह में रोड़ा सा लगता है जिसके लिये समाज,शिक्षक,सरकारी व्यवस्था उत्तरदायी है। चूँकि शिक्षा देना अंतरात्मा की आवाज पर निर्भर है ,इसलिए बंधुआ मजदूर की तरह व्यवहार से शिक्षा प्राप्त करवा पाना असंभव है क्योंकि यह अतिसंवेदनशील होता है, इसलिये मानसिक रूप से प्रताड़ित करके शिक्षकों से काम ले पाना नामुमकिन है।इसलिये समाज के लोगों के द्वारा भी शिक्षक का बार-बार आलोचना किया जाना बच्चों के शिक्षा पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है।
अंत में हम कह सकते हैं कि शिक्षक वह मोमबत्ती है जो खुद जलकर सबको उजाला देता है,इसलिये ज्ञान देने वाले गुरु का बंदन है,उनके चरणों की धूल भी चंदन है। विश्व के तमाम विद्वान शिक्षकों को चरणस्पर्श प्रणाम करते हुये अपनी लेखनी को विराम दे रहा हूँ।
आलेख साभार-श्री विमल कुमार"विनोद"
शिक्षक,बांका
(बिहार)।

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