सुरेश नामक एक साधारण सा बालक जो कि बचपन से ही तीक्ष्ण बुद्धि का तेज बालक है।बचपन से ही वह मेधावी किस्म का बालक जो कि ग्रामीण परिवेश में पला-पोशा गया। वह गाँव में ही रहकर पढ़ा-लिखा तथा क्रमशः आगे बढ़ता गया।उसके अंदर जीवन में उच्च शिक्षा प्राप्त करके उत्कृष्ट प्रदर्शन करने की ललक थी।वह निरंतर आगे बढ़ते हुये अच्छी नौकरी प्राप्त करने की तलाश में था, लेकिन कहीं किनारा न मिला तो वह सरकारी विद्यालय में शिक्षक बनकर अपने आप को गौरवान्वित महसूस करने लगा।सरकारी विद्यालय में शिक्षक बनकर वह बच्चों को नैतिकता,अनुशासन,देशप्रेम, सहयोग आदि की बातों को सीखने की ओर प्रेरित करने लगा।उनको जीवन के प्रारंभ से ही अनुशासन प्रिय लग रहा था।सरकारी विद्यालय में नौकरी करते हुये,अपने सेवा के अंतिम।काल में विद्यालय प्रधान बनने का सुअवसर प्राप्त हुआ।विद्यालय को संचालित करने में वह लगातार अपने बुद्धि,विवेक का प्रयोग करने का प्रयास करता रहा।अपने सिद्धांत के रास्ते पर चलने के चलते इनको विद्यालय प्रधान के रूप में सही तरीके से काम करने वालों का सहयोग तो मिलता था,लेकिन बहुत सारे लोग ऐसे भी थे जो कि इनको राह से विचलित करने का प्रयास करते थे।इनको यही समझ में आ रही थी कि आखिर मैं इस पद पर आया हूँ तो इस काम को बखूबी निपटा ही लूँगा।
वह विद्यालय प्रधान की जिन्दगी में सुबह से शाम तक अपनी नौकरी के सफल संचालन हेतु बैचेनी सी बनी रहती थी।सुबह बिछावन से जगने के बाद से रात में सोने के पहले तक उसको नौकरी छोड़कर कुछ भी सोचने के लिये नहीं रहता था।
पहले तो विद्यालय प्रधान बनने की ललक से ओत-प्रोत सुरेश अपने आप में खुशी से सातवें आसमान पर था,लेकिन धीरे-धीरे जब चारो ओर से उत्तरदायित्व का पहाड़ इन पर हावी होने लगा तब तो इनकी स्थिति"भई सांप छछूंदर की गति मोरी,उगलत आनहर निगलत कोढ़ी होई वाली बात सी हो गयी"।कभी-कभी तो सुरेश को ऐसा महसूस हो रहा था कि विद्यालय प्रधान का पद छोड़ दूँ,फिर उसको अपने गौरवान्वित पद का भी ख्याल आता था।यह इस बात को सोच-सोचकर परेशान होने लगा कि आखिर किसकी बात सुनी जाय, किसकी न सुनी जाय,जो इनको असमंजस में डाल देता था।विद्यालय यदि समय से न खुला तो ग्रामीण, बच्चे,विद्यालय प्रबंधन तथा विभागीय आदेश का कोपभाजन बनना पड़ता था। विद्यालय में इनके साथ काम कर रहे सहकर्मी की स्थिति तो और भी इनको दयनीय बना देती थी,जो कि प्रत्येक विद्यालय में देखने को मिलती है।जरा-जरा सी बात पर इन पर लोग तथा विभागीय पदाधिकारी हावी हो जाया करते थे।इसके बावजूद भी इनको अपनी जिम्मेवारी निभानी ही पड़ रही थी।
सुरेश विद्यालय प्रधान बनने के बाद तो नित्य ससमय आकर अपने कार्य का निष्पादन करना अपना दायित्व समझता था,इसके बावजूद भी वह छोटी-छोटी भूल के कारण तबाही के शिखर पर अपने को झूलता देखता था। एक दिन सुरेश अपनी भूल नहीं बल्कि किस्मत की अनहोनी के फंदे में फंसा हुआ बहुत परेशान था।वह अपने आप को निराश समझते हुये अपनी टूटी-फूटी घर में बैठा हुआ है,तभी उसकी नजर एक मकड़े के द्वारा बनाये गये जाल पर जाती है।वह उस"मकड़जाल"को बहुत गौर से देखने लगता है,जिसमें वह मकड़ा अपने द्वारा ही बनाये गये जाल पर उलझ कर फंसा हुआ है।इसको देखकर वह अपने आप में भी वैसा ही महसूस कर रहा है,लेकिन करे तो क्या करे,जाये तो कहाँ जाये,सरकार की सेवा तो करनी ही है।
आलेख साभार-श्री विमल कुमार "विनोद" शिक्षाविद।


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