भटकते-युवा पीढ़ी -श्री विमल कुमार - Teachers of Bihar

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Wednesday, 26 October 2022

भटकते-युवा पीढ़ी -श्री विमल कुमार

 एक  मनोविश्लेषणात्मक लेख।

बाल विकास मनोविज्ञान कई अवस्था क्रमशः शैशवावस्था,पूर्व बाल्यावस्था,उत्तर बाल्यावस्था, किशोरावस्था आदि चरणों से होकर गुजरती है।इसके बाद प्रौढ़ावस्था जो कि 18 वर्ष की आयु से प्रारंभ होता है।बाल विकास मनोविज्ञान का मानना है कि किसी भी बच्चे का जन्म के बाद से ही परिवार में माता- पिता, परिवार,समाज,विद्यालय,शिक्षक के द्वारा बच्चों के विकास का प्रारंभ हो जाता है।ऐसी अवस्था में बाल-बच्चों के लगातार देखभाल करने की जरूरत पड़ती है।बच्चों का विकास निरंतर बिना किसी रूकावट के चलती ही रहती है,जो कि आगे चल कर किशोरावस्था के पौदान पर पहुँच जाती है जो कि लड़कियों में 10 से 12 वर्ष में तथा लड़कों में 12 वर्ष से 18 वर्ष के पहले तक चलता ही रहता है।इसके बाद जैसे ही बच्चे-बच्चियां 18 वर्ष के होते हैं, युवावस्था का प्रारंभ हो जाता है।

मेरा यह आलेख,"भटकते-युवा पीढ़ी"जो कि युवकों की वर्त्तमान स्थिति पर आधारित हैं,जहाँ पर हमारा"युवा वर्ग"लगातार तबाही के कगार पर नजर आ रही है,जो कि वर्त्तमान समाज,देश तथा विश्व के लिये एक चुनौतीपूर्ण समस्या बन कर उभर रही है।

मनोविज्ञान का मानना है कि किसी भी व्यक्ति में गुण का विकास आनुवंशिकी तथा वातावरण से होता है,जहाँ पर मुझे लगता है कि आज के युवा पीढ़ी के भटकने के कई कारण हैं,

जिससे आने वाले कल का भविष्य बहुत ही कष्ट दायी नजर आ रही है,जो इस प्रकार हैं-

(1)माता का अंधा प्यार

बच्चे के जन्म के बाद से ही माता अपने शिशु को बहुत प्यार करने लगती है तथा अपने उस बच्चे के द्वारा किये गये कार्य की शिकायत अच्छी नहीं लगती है।इसके अलावे इसकी स्थिति उस गौ  माता की जैसी हो जाती है, जैसे कि गाय अपने बछड़े को लगातार चाटती ही रहती है,चाहे क्यों न उसके बछड़े को खून भी निकल जाये।

(2)पिता की अनदेखी-

अधिकतर पिता जी अपने कार्यों में व्यस्त रहने के कारण अपने बच्चों पर ध्यान नहीं दे पाते हैं।जैसे देखा जाता है कि पुत्र के जिद किये जाने पर पिताजी के द्वारा गाड़ी खरीद दिया गया तथा पिता जी को कार्यालय पहुँचा देने के बाद विद्यालय जाने के नाम पर अधिकतर बच्चे समय का दूरूपयोग करने लगते हैं।एक प्रमुख कहावत है कि,पान क्यों सड़ा,घोड़ा क्यों अड़ा,बेटा क्यों बिगड़ा,जिसका एक मात्र कारण माता-पिता की अनदेखी है।

(3)दिकभ्रमित सामाजिक वातावरण

अत्यधिक जनसंख्या वृद्धि के चलते समाज के बहुत से लोग जो कि लायक बाप के नालायक संतान हैं जो कि बेरोजगारी की मार से जुझते हुये अपनी जिन्दगी को असामाजिक कार्यों तथा गलत असंगति का शिकार होकर आवारगी तथा नशा से संबंधित व्यसन में लिप्त हो जाते हैं तथा माता-पिता के द्वारा समझाये जाने पर उनको मानसिक रूप से प्रताड़ित करने की धमकी देते हैं।

(4)जनसंख्या वृद्धि

जनसंख्या वृद्धि के कारण भी समाज के लोगों को रोजगार के अवसर नहीं मिल पाते हैं,क्योंकि जमीन तथा कृषि योग्य भूमि ज्यों का त्यों पड़ी हुई है,लेकिन जनसंख्या वृद्धि बेतहाशा तरीके से हो रही है।जिसके कारण बेरोजगारी के चलते समाज में लोग सृजनशील कार्य को सोच नहीं पाते हैं।

(5)सरकारी नौकरी करने की भावना से ग्रसित

लोगों को लगता है कि सरकारी नौकरी मिलती, लेकिन पढ़ने के समय में लोगों को जितना प्रयास करना चाहिये उसमें कमी रहने के कारण उस मुकाम तक नहीं पहुँच पाते हैं, जिसके कारण"युवा-पीढ़ी"में भटकाव नजर आती है।

(6)पश्चिमीकरण तथा आधुनिकता का दौर

पश्चिमी सभ्यता के आगोश में उलझी युवा -पीढ़ी अपने रहन-सहन तथा सामाजिक परिवेश में उलझकर तथा नैतिकता का पतन होने के कारण से भी युवा पीढ़ी भटकाव के जाल में उलझता ही चला जा रहा है।

(7)"Digital India"

मोबाइल की दुनियां के दौर में माता-पिता  बचपन से ही अपने बच्चे-बच्चियों को मोबाइल देने में महानता का परिचायक समझते हैं जो कि वर्त्तमान पीढ़ी को तेजी से गर्त में लिये जा रही  है।यों तो मोबाइल आज के समय में विश्व की जिन्दगी के रूप में उभर कर रह गई है,साथ ही वर्त्तमान पीढ़ी को तबाही के शिखर पर लिये जा रही है।

         बचाव के उपाय

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आज के समय में जब कि किशोरावस्था तथा प्रौढ़ावस्था जहाँ युवा वर्ग अपने जीवन की मुख्य धारा से भटकते हुये नजर आते हैं इसको रोकना समाज के लिये अति- आवश्यक है,जिसके लिये-

(1)माता-पिता को अपने बाल- बच्चे को जीवन के शुरूआती दौर से ही उनमें अनुशासन,नैतिकता, मानवता,शिक्षा,सामाजिकता के गुणों का विकास करना जरूरी है।

(2)बदलते हुये परिवेश में समाज को चाहिये कि सुन्दर ढंग से बच्चों को विकसित करने का प्रयास करना चाहिये।

(3)जनसंख्या वृद्धि पर रोक लगाने का स्वंय प्रयास किया जाना चाहिये ताकि समाज में जनसंख्या विस्फोट को रोका जा सके।

(4)आज जब बच्चों का रहन- सहन बदलता जा रहा है तो वैसी स्थिति में अपने बच्चों को किसी भी शैक्षणिक संस्थान में भेजने के पहले उसके गणवेश पर ध्यान दिया जाना चाहिये तथा उसके रहन-सहन पर ध्यान देने का प्रयास करना चाहिये।

(5)मोबाइल जो कि आज के समय में जीवन का अभिन्न अंग तथा समय बिताने का एक आवश्यक साधन बन चुका है, वैसी स्थिति में  मनोगतयात्मक तरीके से बच्चों के मन मस्तिष्क को मोबाइल के प्रयोग पर सावधानी बरतने की सलाह देनी चाहिये।

अंत में मुझे लगता है कि आज "समाज का युवा वर्ग पूरी तरह से भटकाव के चंगुल में उलझा हुआ है,जो कि परेशानी का सबब बनता जा रहा है,तथा वर्त्तमान समय में जीवन की नवीन चुनौती बनती जा रही है,जिससे नवीन युवा पीढ़ी को बचाना अति आवश्यक है।


आलेख साभार-श्री विमल कुमार

"विनोद"प्रभारी प्रधानाध्यापक राज्य संपोषित उच्च विद्यालय

पंजवारा,(बाँका)।

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