ये एक कहानी नही है ,एक वास्तविक घटना है जिसे मैंने बहुत कम उम्र में अपने आंखों से देखा है महसूस किया है ,और बहुत बड़ी सबक भी सीखी है।
मेरे गांव के उच्च विद्यालय में एक शिक्षक हुआ करते थे।गणित और विज्ञान के विशेषज्ञ।जितनी अच्छी विषय पर उनकी पकड़ थी भाषा और सोच उतनी ही खराब थी।घर से बाहर निकल कर काम करने वाली हर महिला उनके लिए चरित्रहीन थी। साथ काम करने वाली महिलाओं के उन्होंने उपनाम बना रखे थे और अक्सर उन्ही उपनामों का प्रयोग करते।कार्यालय में उनकी छवि एक गुस्सैल, झगड़ालू,इंसान की थी ।खुद तो मास्टर्स इन मैथमेटिक्स थे पर पत्नी को मैट्रिक की परीक्षा नहीभी दिलाई थी जबकि वो पढ़ना चाहती थी।
समय चक्र घुमा एकदिन अचानक विद्यालय में ही उनके पेट में तेज दर्द हुआ,जिन लोगो से जीवन भर लड़ते रहे उन्होंने ही अस्पताल पहुंचाया,जिन महिलाओं को चरित्रहीन कहते रहे उन्होंने ही अस्पताल में उनकी पत्नी को सम्हाला।आठ दिन अस्पताल में रहने के बाद पता चला की उन्हें कैंसर है और वो अब कुछ दिन के ही मेहमान हैं।पत्नी के मायके बालों ने सबकुछ सम्हाला क्योंकि अपने परिवार से इन्होंने रिश्ता खत्म कर रखा था,इन्हे लगता था की परिवार से जुड़े रहकर इन्हे धनहानि होगी।
कुछ ही दिनो में शिक्षक महोदय चल बसे।और शुरू हो गया उनकी पत्नी और बच्चों का बुरा दिन।उन्होंने कार्यालय संबंधित कोई भी जानकारी अपनी पत्नी को नही दी थी कोई जीवन बीमा नही लिया था।
उनकी पत्नी रोज जिला मुख्यालय जाती पूरा पूरा दिन बैठी रहती और कोई भी काम नही होता।एक दिन संयोग से उनका रिक्शा मेरे घर के आगे पलट गया उनके हाथ में चोट आई थी मेरी मां ने उनकी मलहम पट्टी की,शरीर के जख्मों मलहम लगते ही मन के घाव दुखने लगे,उन्होंने रो रो कर सारी बात मेरी मां को बताई,।मां ने हौसला दिया की अब सारा काम होगा क्योंकि मेरे पिता जिला शिक्षा कार्यालय में कार्यरत थे।दूसरे दिन वो फिर मेरे घर आई,मेरे पिता ने उनसे सर्विस बुक मांगा जो उनके पास होना चाहिए था,पर उन्होंने अपने पति से कभी ये शब्द भी नहीं सुना था आखिर फिर मेरी मां और पिता उनके घर गए शिक्षक महोदय के अलमारी से ढूंढ़ कर सर्विस बुक निकाला गया और फिर उनके अनुकंपा के लिए आवेदन दिया गया।
एक शिक्षक की पत्नी को चतुर्थवर्गीय कर्मचारी की नौकरी मिली,मजबूरी थी तीन बच्चों का पालन करना था नौकरी करनी पड़ी।फिर शुरू हुआ उनके साथ तमाम उच्च शिक्षित लोगों का अशिक्षित व्यवहार,पति के कर्मों की सजा पत्नी सह रही थी।
अब वो मेरे परिवार के लिए अपरिचित नही थी मेरी मां को उन्होंने अपनी बड़ी बहन मान लिया था अब वो हमारी मौसी थी।
मौसी की मेहनत ने सहनशीलता ने रंग दिखाया उन्होंने अपनी दोनो बाटियों को ग्रेजुएशन कराया उनकी शादी करवाई,छोटा बेटा जो मेरे साथ पढ़ता था उसने जी तोड़ मेहनत की और एयरोनॉटिक्स इंजीनियर बना।
कुछ सालों बाद मौसी ने VRS ले लिया।जाने से पहले हम सब से मिलने आई और उन्होंने जो कहा वो आगे लिख रही हूं एकबार आप भी जरूर विचार करे
@कार्यक्षेत्र की महिला भी किसी के घर की इज्ज़त है उनका सम्मान करें, क्योंकि कोई नही जानता की कल आपके घर की महिला को भी कार्यक्षेत्र में आना पर सकता है।
@ अपशब्द का प्रयोग आपका सहयोग प्राप्ति का मार्ग अवरूद्ध करता है।
@ अपनी पत्नी को इतना शिक्षित जरूर करें की कल की चुनौतियों के लिए वो तैयार रहे।
@ सबसे महत्वपूर्ण की कार्यक्षेत्र में एक रिश्ता जरूर ऐसा बनाए जो आपके न होने पर भी आपके परिवार के लिए सहारा बन सके ।एक दोस्त ,एक भाई या एक बहन जरूर कमाएं।
अमृता सिंह
नवसृजित प्राथमिक विद्यालय डूमरकोला
प्रखंड: चांदन
जिला : बांका

No comments:
Post a Comment