सरकारी उच्च माध्यमिक विद्यालय केवल पंजीयन केंद्र न बनें, निजी विद्यालयों पर इंस्पेक्टर राज भी खत्म हो।
बिहार में शिक्षा की स्थिति आज भी गंभीर चिंता का विषय बनी हुई है। एक ओर सरकारी उच्च विद्यालयों की पहचान केवल पंजीयन केंद्र तक सीमित होती जा रही है, तो दूसरी ओर निजी विद्यालयों पर अनावश्यक निरीक्षण और नियंत्रण का शिकंजा कसता जा रहा है। ऐसे में यह प्रश्न अत्यंत प्रासंगिक हो जाता है कि आखिर बिहार में शिक्षा का वास्तविक विकास कैसे संभव होगा?
देश का दूसरा सबसे अधिक जनसंख्या वाला राज्य होने के बावजूद बिहार शिक्षा के क्षेत्र में अपेक्षाकृत पिछड़ा हुआ है। गरीबी, बेरोजगारी, पलायन और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की कमी ने इस समस्या को और गहरा कर दिया है। वर्षों से यह राज्य श्रमिक-प्रेषक के रूप में जाना जाता रहा है। इस पहचान को बदलने के लिए शिक्षा को मजबूत आधार बनाना होगा।
राज्य सरकार शिक्षा पर अपने कुल बजट का लगभग 25 प्रतिशत व्यय करती है, जो सराहनीय है। बावजूद इसके, अपेक्षित परिणाम सामने नहीं आ पा रहे हैं। विभिन्न आकलन रिपोर्टें यह दर्शाती हैं कि सरकारी विद्यालयों में शैक्षिक गुणवत्ता संतोषजनक नहीं है। विशेषकर उच्च विद्यालयों में छात्रों की उपस्थिति केवल परीक्षा के समय ही देखने को मिलती है। यह स्थिति स्पष्ट करती है कि समस्या केवल संसाधनों की नहीं, बल्कि उनके प्रभावी उपयोग, निगरानी और जवाबदेही की भी है।
बीपीएससी के माध्यम से चयनित शिक्षकों की नियुक्ति के बाद भी यदि छात्र महंगी फीस देकर कोचिंग संस्थानों का सहारा लेने को विवश हैं, तो यह शिक्षा व्यवस्था की गंभीर खामी को दर्शाता है। इस पर गंभीर आत्ममंथन और सुधारात्मक कदम उठाने की आवश्यकता है।
सबसे पहले, उच्च माध्यमिक विद्यालयों को विज्ञान, कला एवं वाणिज्य संकायों के अनुसार सुव्यवस्थित रूप से चिन्हित किया जाए। इन विद्यालयों में सभी विषयों के योग्य शिक्षक, सुसज्जित प्रयोगशालाएं, पुस्तकालय, डिजिटल संसाधन और आवश्यक शैक्षणिक सुविधाएं सुनिश्चित की जानी चाहिए। इससे विद्यार्थियों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा अपने ही विद्यालय में प्राप्त हो सकेगी।
दूसरी ओर, निजी विद्यालय बिना सरकारी सहायता के भी बेहतर शैक्षणिक परिणाम दे रहे हैं। यही कारण है कि अधिकांश जागरूक अभिभावक अपने बच्चों को निजी विद्यालयों में भेजना पसंद करते हैं। ऐसे में सरकार को चाहिए कि निजी विद्यालयों पर अनावश्यक “इंस्पेक्टर राज” समाप्त करे और विद्यालय खोलने के नियमों में युक्तिसंगत शिथिलता लाए। जब अधिक निजी विद्यालय स्थापित होंगे, तो स्वस्थ प्रतिस्पर्धा के कारण कम शुल्क में बेहतर शिक्षा उपलब्ध हो सकेगी।
साथ ही, यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि निजी विद्यालयों द्वारा 25 प्रतिशत वंचित वर्ग के बच्चों को दी जाने वाली निःशुल्क शिक्षा की प्रतिपूर्ति राशि उसी शैक्षणिक सत्र में समय पर प्रदान की जाए। इससे निजी संस्थानों का मनोबल भी बढ़ेगा और वे अधिक प्रभावी ढंग से अपनी भूमिका निभा सकेंगे।
विद्यालयों में फेस डिटेक्शन आधारित उपस्थिति प्रणाली लागू की जानी चाहिए तथा वार्षिक परीक्षा में सम्मिलित होने के लिए न्यूनतम 75 प्रतिशत उपस्थिति अनिवार्य की जानी चाहिए। इससे छात्रों की नियमितता बढ़ेगी और शिक्षण प्रक्रिया अधिक प्रभावी बनेगी।
इसके अतिरिक्त, विद्यालय अवधि के दौरान कोचिंग संस्थानों के संचालन पर प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए, ताकि छात्र पूरी तरह विद्यालयी शिक्षा पर ध्यान केंद्रित कर सकें।
अंततः, यदि सरकारी विद्यालयों में योग्य शिक्षक, पर्याप्त संसाधन और सुदृढ़ जवाबदेही प्रणाली सुनिश्चित की जाती है, तभी विद्यार्थियों का सर्वांगीण विकास संभव हो सकेगा। शिक्षा ही वह सशक्त माध्यम है, जिसके द्वारा बिहार के बच्चे आत्मनिर्भर, सक्षम और भविष्य के नेतृत्वकर्ता बन सकते हैं। अब समय आ गया है कि शिक्षा को केवल नीतियों और घोषणाओं तक सीमित न रखकर उसे धरातल पर प्रभावी परिणाम देने वाली व्यवस्था में परिवर्तित किया जाए ।
संकलनकर्ता
राकेश कुमार
विज्ञान शिक्षक
मध्य विद्यालय, अमौना।

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