बालक जब माता के गर्भ में आता है उसी समय से माता-पिता तथा परिवार के सभी सदस्य उसके उज्जवल भविष्य की कामना करते हैं।बच्चे के जन्म के साथ ही परिवार में तरह-तरह के उत्सव होने लगते हैं
उसके बाद मृत्यु लोक में उसकी जीवन लीला प्रारंभ हो जाती है।जीवन में अग्रेतर वह अपनी जीवन लीला की कहानियों को लिखना प्रारंभ कर देता है।बचपन खेल में बीता,जवानी नींद से सोया,बुढ़ापा देखकर रोया वाली बात होती है।इस बीच समय की अनवरत चलने वाली चक्की की कहानी कुछ ओर है,जो कि कब किसको अपनी चक्की में पीस देगा तह कहना मुश्किल है।इसी संदर्भ में कबीर दास ने कहा है कि"माटी कहे कुम्हार से तू काहे रौंधे मोय,एक दिन ऐसा आयेगा मैं रौंधूगा तो वाली बात है।
इस मृत्यु लोक की कहानी ही कुछ है जो कि बहुत कुछ अपने कर्मों का फल होता है।लोग सुबह सो कर उठते समय कहते हैं कि हे प्रभुआज का दिन मेरा मंगलमय हो,मेरी जिन्दगी अच्छी तरह से कटे,जीवन आनन्द दायक हो लेकिन एक मां अपने बच्चे को कुछ लाने के लिये दुकान पर भेजती है।बच्चा घर से खेलते हुये रूपया लेकर दुकान से समान लाने के लिये भेजता है,लेकिन किस्मत का फेरा कि घर लौटते समय तेज रफ्तार से आती हुई गाड़ी के चपेट में आकर उसकी अकाल मृत्यु हो जाती है,हाय रे जीवन का ख्वाब,इसीलिए कहा गया है कि ख्वाब हो या तुम कोई हकीकत कौन हो यह बतलाओ"।लेकिन जीवन की इहलीला एक हकीकत है,जैसे कि मेरा जीवन कोरा कागज,कोरा ही रह गया,कभी सोची हुई बात पूरी नहीं हुई,जीवन का सपना अधूरा ही रह गया।
ऐसे तो मृत्यु जीवन का अकाट्य सत्य है जिसको हर जीव को वरन करना ही होगा,लेकिन कब,कहाँ और कैसे यह किसी को भी पता नहीं है और यह पता चल जाय तो सृष्टि का सिद्धांत ही समाप्त हो जायेगा।चूँकि जिसके साथ यह घटना घटती है उसी को जीवन की यह कष्टदायक जीवन लीला का दर्दनाक एहसास होता है,उसी को उसका दर्द होता है।
कल तक हंसता-खेलता परिवार अचानक गृहस्वामी के मृत्यु को वरण कर लेने के बाद ध्वस्त हो जाता है तथा"कल चमन था आज यह सेहरा हुआ,देखते ही देखते यह क्या हो गया वाली बात हो जाती है।"
जब किसी का गृहस्वामी इहलोक को छोड़कर परलोक गमन कर जाता है,अचानक परिवार पर दुःख के काले बादल मंडराने लगते हैं,विपत्ति का पहाड़ फूट पड़ता है।उस स्थिति में उसका वही हाल होता है कि,"दुनियाँ बनाने वाले क्या तेरे मन में समायी तूने काहे को दुनियाँ बनायी,
तूने काहे को दुनियाँ बनायी।"लेकिन यह तो सृष्टि का खेल है,जिससे न तो आज तक कोई जीता है,और न तो जीत पायेगा।हमेशा इसका पाला प्रकृति के गोद में ही गया है।
इसलिये मुझे ऐसा महसूस होता है कि"जो मिल गया उसे मुकद्दर समझ लिया" वाली बात समझकर लोगों को अंत में संतुष्ट होना ही पड़ेगा।इसका एक ही उपाय है कि विपत्ति में धैर्य रखना ही होगा,बाद बाकी तो ईश्वर को समर्पित करके ही चलना होगा।"
आलेख-श्री विमल कुमार"विनोद"
प्रभारी प्रधानाध्यापक राज्य संपोषित उच्च विद्यालय पंजवारा,बांका (बिहार)।

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