किसान प्रकृति के जवान साधु- श्री विमल कुमार"विनोद" - Teachers of Bihar

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Wednesday, 7 December 2022

किसान प्रकृति के जवान साधु- श्री विमल कुमार"विनोद"

एक पर्यावरणीय लेख।

भारत एक कृषि प्रधान देश है, जहाँ की लगभग 70%जनसंख्या कृषि पर निर्भर करती है।कृषि के क्षेत्र में कार्य करने वाले लोग किसान कहलाते हैं,जो कि संसार के लोगों के भोजन के लिये भोज्य  पदार्थ का उत्पादन करने का  प्रयास करते हैं। साथ ही प्रकृति का अर्थ है भौतिक जगत में पाये जाने वाली  ईश्वर के द्वारा प्रदान की गई आकुत वस्तुयें,जिसका उपभोग इस संसार के सभी जीव-जंतु करते हैं। सामान्यतः प्रकृति का अर्थ हैं पर्यावरण में पाये जाने वाले असंख्य जीव-जंतु तथा विभिन्न प्रकार की जैविक-अजैविक वस्तुयें।

यद्यपि मानव प्रकृति का एक हिस्सा है तथा मानवीय क्रिया को प्रायः अन्य प्राकृतिक विषयों से भी समझा जा सकता है। दूसरे शब्दों में प्रकृति का अर्थ "वैसे चीजों से जो ईश्वर ने मनुष्यों को निःशुल्क प्रदान किये गये हैं"।किसान प्रकृति को अपनी तपस्या की भूमि मानकर उसमें दिन-रात लगातार मेहनत करता है,उसी तरह से अन्य पेशा करने वाले को भी चाहिये कि वह अपनी कर्मभूमि में मेहनत करे।

मेरा यह आलेख किसान प्रकृति के जवान साधु हैं,भारतीय कृषकों पर आधारित हैं---जैसा कि सभी लोग जानते कि किसान कृषि कार्य को दिन-रात मेहनत करके करते हैं।चाहे वैशाख-जेठ की तपती धूप हो या पूस-माघ की ठंड या सावन भादो की मुसलाधार वर्षा,सारे समय में किसान बिना किसी तरह के सुख-चैन को देखते हुये,अपने खेतों पर अनवरत कृषि कार्य को करते रहते हैं।जेठ की तपती दुपहरी में गर्मी और पसीने से तर-बतर किसान लगातार खेतों में कृषि कार्य को करते रहते हैं।जिस तरह से साधु पहाड़ की कंदराओं में  भूखे-प्यासे वर्षों तपस्या में लीन रहते हैं,उसी तरह किसान भी अपने कृषि कार्य में लगे रहते हैं।

जैसा कि सभी जानते हैं कि भारतीय कृषि,मानसून तथा प्रकृति के साथ एक प्रकार का जुआ है।समय की अनिश्चितता तथा कृषि को किस्मत की लकीर के साथ का एक जुआ मानते हुये भी किसान एक साधक की तरह खेतों में दिनभर काम करते रहता है। चिड़ियों की चहचहाट के पहले ही किसान खाट छोड़कर उठ जाता है और कृषि से संबंधित सामनों को लेकर खेतों में चल जाता है।

प्रत्येक कार्य करने वाले को  किसान जो कि प्रकृति के जवान साधु कहलाते हैं से प्रेरणा लेकर सृजनशील तथा उत्पादन युक्त कार्य को करने का प्रयास करना चाहिये तथा अपने कर्म के प्रति समर्पित होना चाहिये,ताकि हम भी अपने कर्म स्थली के साधु बन सके।हमें भी अपने कर्मस्थली में कर्मठता एवं सृजनशीलता के साथ-साथ उत्कृष्ट कार्यों को करने का प्रयास करना चाहिये, जहाँ हम किसान की तरह सच्चे लगन,धैर्य,उच्चतम सकारात्मक सोच के साथ अपनी-अपनी कर्म भूमि में सच्चे साधक की तरह विद्यालयी बच्चों के विकास को लेकर साधना करें तो निश्चित रूप से शिक्षा रूपी कृषि अच्छी हो सकती है।लेकिन दुर्भाग्य की बात है कि थोड़ी सी विद्यालयी कार्य में परेशानी होने के कारण हम मेहनत करना छोड़ देते हैं। हम शिक्षकों को भी किसान की तरह संघर्ष करके अपनी कृषि(बच्चों) को सुन्दर तरीके से सिंचाई करने तथा तरह-तरह की नई-नई तकनीकों से विद्यालयों का विकास करना चाहिये। हमें भी बच्चों में तरह-तरह के कौशल का विकास कराकर,(जिस प्रकार किसान तरह-तरह के फसल उपजाता है),कि तरह बच्चों में भी तरह-तरह की गतिविधियों के द्वारा उनका विकास करना चाहिये,तभी आप एक सच्चा साधु बन सकते हैं।

  अंत में,हम कह सकते हैं कि एक सच्चा साधु वही हो सकता है जो कि दृढ़ विश्वासी ,कर्मठ, हठधर्मी हो,क्योंकि सच्चा साधु बनने के लिये कार्य के प्रति समर्पण आवश्यक हैं। आइये हम लोक भी अपने-अपने कर्मस्थल में सच्चे साधक की तरह सुन्दर, सृजनशील ,दृढ़ निश्चयी होकर कर्म करें तथा अपने कार्य में सच्चे साधु की तरह तपस्या करें तभी जीवन सफल हो पायेगा।


आलेख साभार-श्री विमल कुमार"विनोद" प्रभारी प्रधानाध्यापक

राज्य संपोषित उच्च विद्यालय पंजवारा बांका।

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