किसी जीव को चारों ओर से जो जैविक तथा अजैविक घटक घेरे रहते हैं उसे हम पर्यावरण कहते हैं।आने वाले समय में मनुष्य लगातार विकास की ओर बढ़ता जा रहा है।साथ ही मनुष्य जितनी ही तेजी से आगे बढ़ता जायेगा उतनी ही तेजी से प्राकृतिक संसाधनों का अधिक-से-अधिक प्रयोग करना चाहेगा।साथ ही जैसे ही प्राकृतिक संसाधनों के अधिकतम उपयोग से प्राकृतिक दोहन की संभावना बढ़ती ही जायेगी।
चूँकि आज के समय में पर्यावरण लगातार तबाही के कगार पर है क्योंकि वर्तमान समय में पर्यावरण पर चिंतन करना आवश्यक है।आज पर्यावरण एक ज्वलंत मुद्दा बनती जा रही है,जिसको बचाने के लिये आज 5जून विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर बचाने का संकल्प लेना चाहिये।
"हम जल को बचायेंगे,
जंगल को बचायेंगे,
जमीन को बचायेंगे,
हम धरती माँ के संतान हैं,
धरती माँ को बचायेंगे"।
आज के समय में पर्यावरण की मुख्य समस्यायें हैं, जैसे-नदियों से अवैध बालू का उठाव,सड़कों के दोनों ओर वृक्षों के कटने के बाद पुनः नहीं लग पाना,बरसात के जल का संरक्षणन हो पाना,अंधाधुंध रासायनिक खाद तथा कीटनाशक का प्रयोग किया जाना,पोलीथिन का प्रयोग किया जाना,क्लोरोफलोरो कार्बन का ज्यादा उत्सर्जन किया जाना,अधिक संख्या में पेट्रो केमिकल से चलने वाली गाड़ियों की संख्या में बढ़ोतरी आदि।
(1)अवैध बालू का उठाव-
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विकास की अंधाधुंध दौड़ में लोग सड़कों के किनारे मकान बनाकर कोई रोजगार करने की बात सोचते हैं-जिसके मूल में जनसंख्या वृद्धि ,तथा बेरोजगारी है।साथ ही ज्यादा से ज्यादा रूपया कमाने के लिये बिना किसी मानक को निर्धारित किये ही अवैध बालू का उठाव किया जा रहा है जिसके कारण अनेकों नदियों से अवैध बालू का उठाव होने के कारण नदियों का अस्तित्व खतरे में पड़ गया है। इससे पूरे जैव विविधता का अस्तित्व खतरे में नजर आता है।
(2)अंधाधुंध वृक्षों का कटाई-
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सड़कों के चौड़ीकरण तथा विकास बाबा को खुश करने के नाम पर अंधाधुंध वृक्षों की कटाई तथा उसके जगह पर नये वृक्षों का न लगाये जाने से पर्यावरण के लिये घातक सिद्ध होता है।साथ ही सड़कों के किनारे लगे वृक्षों के सड़क चौड़ी करण के नाम पर काट दिये जाने के कारण सड़कों में पैदल चलने वाले राहगीर वृक्ष की छाया पाने को लालायित रहते हैं।
(3) बरसात के जल का संरक्षण-
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मनुष्य के जीवन का यह दुर्भाग्य है कि वह प्रकृति से सिर्फ प्राप्त करना अपना अधिकार समझता है,उसका संरक्षण करना अपना उत्तरदायित्व नहीं। क्योंकि कंक्रीट के जंगल से जल की कामना मनुष्य की नासमझी है।आखिर वर्षा के जल को पृथ्वी के भीतर जाने वाले रास्ते को सीमेंट और कंक्रीट से बंद कर दिया है तथा अपने-अपने घरों में पनसोखा भी नहीं बनाया है। इसके अलावे घर बनाते समय लोगों को अपने घर के वर्षा के संपूर्ण जल को पृथ्वी के अंदर ले जाने के लिए भूमि के अंदर तक पाइप डाल देना चाहिए।साथ ही तालाब आज खेल का मैदान बनता जा रहा है जिसके जीर्णोद्धार की सख्त आवश्यकता है।
(4) अंधाधुंध रासायनिक खाद तथा कीटनाशक का प्रयोग-
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किसान खेती करते समय अधिक फसल उत्पादन करने के लिये मानक से अधिक रासायनिक खाद तथा कीटनाशक का प्रयोग करके केचुआ,घोंघा,मेढ़क,मांगूर तथा अनेक जैव प्रजातियों को नष्ट कर देते हैं।साथ ही हरी साग सब्जियों को उपजाते समय रासायनिक कीटनाशकों का प्रयोग किया जाना लगभग 40%कैंसर होने की संभावना को बढ़ावा देता है।लेकिन मनुष्यों की स्थिति ठीक वैसी ही है जैसे सर्प के मुँह में जकड़े होने के बाबजूद भी मेंढक अपना मुँह खोले रखता कि कोई कीट उसके मुँह में भक्षण के लिये आ जाता।
(5)पोलीथिन का प्रयोग बंद न होना-
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जैसा कि सभी को पता है कि पोलीथिन आज भूमि को कैंसर की तरह नष्ट किये जा रही है। 2018 के विश्व पर्यावरण दिवस का स्लोगन था"बीट प्लास्टिक पोलयूशन"जो कि आजअपनी असफलता पर आँसू बहाता हुआ नजर आता है।देश के कुछ प्रांतों में तो पोली बैग पर प्रतिबंध लगा दिया गया है लेकिन शहर के बड़े- बड़े पोस्टरों की शोभा बढ़ाता मात्र बनकर ही रह गया। अफसोस की बात यह है कि जो अपने को पर्यावरण विशेषज्ञ कहते हैं तथा पौधों को विकसित करते समय वन पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन विभाग भी पोलीथिन के पैकेट का प्रयोग करता है जो कि दुर्भाग्य की बात है।
(6)क्लोरोफलोरो कार्बन गैस का बेतहाशा प्रयोग किये जाने से
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क्लोरोफलोरो कार्बन ऐसी गैस है जो कि ओजोन परत को पतला बनाता है,जिसका प्रयोग किया जाना विश्व पर्यावरण के लिये चिंता की बात है, लेकिन मनुष्य करे तो क्या करे इस बेतहाशा गर्मी से बचने के लिये वातानुकूलित कमरों में रहना आज साधारण सी बात हो गई है।
(7)पेट्रो केमिकल्स युक्त धुआँ निकालने वाली गाड़ियों में बेतहाशा वृद्धि-
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सड़कों पर बेतहाशा असंख्य गाड़ियों के परिचालन होने के कारण तथा बहुत से परिवार के सभी सदस्यों के लिये अलग-अलग गाड़ी है जो कि बहुत ज्यादा मात्रा में रसायन युक्त धुआँ निकालती है जिसके चलते पृथ्वी का तापमान बहुत बढ़ जाता है।जिसके चलते पृथ्वी के दाब और तापमान में असंतुलन पैदा हो जाती है जो कम वर्षा होने का मुख्य कारण भी है। साथ ही कोयला खदानों तथा जंगलों में वर्षों से लगी आग एवं बेकार का बिजली के प्रयोग किये जाने से भी वैश्विक ताप में वृद्धि होती है।
आज के वर्तमान समय में जब कोरोना वायरस के संक्रमण से भारत के साथ-साथ विश्व भी अपनी तबाही के चरम शिखर पर है,जिससे बचाव के लिये लोगों के शरीर में रोग रोधक क्षमता का मजबूत होना आवश्यक है।चूँकि आज लोगों का भोज्य पदार्थ में रासायनिक खाद,रासायनिक कीट नाशक जिसमें थाइमाइट, फोलिडाॅल तथा अन्य जानलेवा खतरनाक चीजों का धड़ल्ले से प्रयोग हो रहा है जिससे शरीर की रोगरोधक क्षमता कम होती जा रही है।इस कारण से भी कोरोना वायरस के संक्रमण के संकट से उबरने में परेशानी हो रही है।
पर्यावरण दिवस के अवसर पर हमलोगों को बिहार के माननीय मुख्यमंत्री श्री नीतीश कुमार जी के जल,जीवन और हरियाली कार्यक्रम को भी मूर्त रूप देने की आवश्यकता है क्योंकि,"वृक्ष का अर्थ है जल,जल का अर्थ है रोटी और रोटी ही जीवन है।"
अंत में, विश्व के तमाम लोगों से अनुरोध है कि अधिक-से-अधिक वृक्ष लगाने का संकल्प लेते हुये प्रदूषण मुक्त करने का प्रयास करना चाहिये ।ऐसा माना जाता है कि"प्रदूषण जनसंख्या तथा परागण दोनों को मारती है"। साथ ही मैं आप सबों से आशा के साथ उम्मीद करता हूँ कि अगर जिन्दगी जीना है तो प्रकृति के साथ छेड़छाड़ करना बंद कर दें नहीं तो "माटी कहे कुम्हार से तू काहे रौंधे मोय ,एक दिन ऐसा आयेगा मैं रौंधूंगा तोय "वाली बात होगी।
विश्व को पर्यावरण के कुप्रभाव से बचाने की उम्मीद के साथ पूरे विश्व की जनसंख्या को विश्व पर्यावरण बचाये रखने की शुभकामना।
आलेख साभार-श्री विमल कुमार "विनोद"प्रभारी प्रधानाध्यापक
राज्य संपोषित उच्च विद्यालय पंजवारा बांका(बिहार)।

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