प्रकृति में ईश्वर ने अनगिनत अनमोल वस्तुयें दे रखी हैं जिसमें माता-पिता,अविभावक,समाज, किसान,विद्यालय,शिक्षक आदि।ये सारे इस प्रकृति को सुसज्जित करने वाले कलाकार हैं।चूँकि ईश्वर प्रत्येक कार्य को अपने से नहीं कर सकते हैं,इसलिए उन्होंने अविभावक ,किसान तथा शिक्षक को बनाया है जो कि ईश्वर के आशीर्वाद से अपने-अपने क्षेत्रों के उत्कृष्ट कार्यों को करते हैं।
(1)अविभावक-अविभावक के अंतर्गत सबसे पहले माता जी जो कि बच्चे को गर्भाधान से लेकर सम्पूर्ण जीवन पर्यन्त तक उनका निर्माण ,विशेषकर शैशवावस्था से किशोरावस्था तक बच्चों का निर्माण करने का प्रयास करती है।
बच्चा जब जन्म लेता है ,उसके बाद से बच्चे की सेवा करना, उसको एक सुन्दर नागरिक बनाने का काम माता-पिता ,अविभावक तथा समाज के लोग मिलकर ही करते हैं।चूँकि बच्चों में गुण उसके माता-पिता तथा पर्यावरण यानि समाज से आते हैं ,जिसमें समाज के लोग उनके अविभावक भी होते हैं जो कि समाज के आने वाले पीढ़ी को एक सुन्दर नागरिक बनाने का प्रयास करते हैं ताकि वह बड़ा होकर एक अच्छा नागरिक बन सके।
(2)शिक्षक-समाज का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू है शिक्षक जो कि राष्ट्र निर्माता कहलाता है ,जिनके कंधों पर आने वाले भावी पीढ़ी को बनाने की जिम्मेदारी रहती है। जैसे ही बालक-बालिका उत्तर बाल्यावस्था में प्रवेश करते हैं तो
उनके माता-पिता शिक्षा ग्रहण करने के लिये पहले गुरुकुल और आज के समय में भेजती हैं।विद्यालय में विद्यार्थी घर की चहारदीवारी के बाहर अपने शिक्षक से उनके पाठ्यचर्या के अनुसार ज्ञानार्जन करने का प्रयास करते हैं,जहाँ उनके गुरुजी शिक्षा प्रदान करने का प्रयास करते हैं।विद्यालय में उनको पुस्तकीय ज्ञान,नैतिकता,प्रेम, सहयोग,अनुशासन इत्यादि का ज्ञान प्राप्त होता है।वहाँ पर विधार्थी का सम्पूर्ण विकास कराने का प्रयास किया जाता है जहाँ पर उनके द्वारा अर्जित किये गये ज्ञान का सतत तथा लगातार मूल्यांकन कर उसके विकास की बात सोची जाती है।विद्यार्थी के जीवन की यह अवस्था ऐसी होती है जहाँ पर की गई जरा सी भूल राष्ट्र निर्माण के मार्ग में एक रोड़ा बनकर विनाशकारी रूप धारण कर सकती है।इस प्रकार से हम देखते हैं कि शिक्षक की भूमिका भी अविभावक की तरह जीवन के लिए बहुत उपयोगी है।
(3)किसान-किसान को प्रकृति का जवान साधु कहा जाता है जो कि रात-दिन खेत पर काम करता रहता है । सूर्य के किरणों के निकलने से पहले ही किसान की नींद खुल जाती है तथा अपने खेतों की ओर निकल पड़ता है।खेत जाकर वह अपने द्वारा लगाये गये पौधों का सतत् एवं लगातार मूल्यांकन करता है।हर समय उसकी इच्छा होती है कि उसके खेतों में अच्छी फसल हो जिसके कारण उसका जीवन मंगलमय संभव हो सके।
समीक्षात्मक तौर पर यदि देखा जाय तो यही प्रतीत होता है कि माता-पिता,अविभावक,शिक्षक तथा किसान तीनों की स्थिति एक ही जैसी है,क्योंकि एक कहावत है कि"घोड़ा क्यों अड़ा,पान क्यों सड़ा और बेटा क्यों बिगड़ा, विद्यालय का परीक्षाफल क्यों खराब हुआ"।तीनों का एक ही कारण है कारण उसके संरक्षक की अनदेखी।
जहाँ तक मेरा सवाल है ,मैं एक अविभावक,शिक्षक तथा किसान हूँ।सबसे पहले मैं तो एक पिता हूँ जो कि अपने दोनों पुत्रों के जीवन की प्रतिदिन की गतिविधि पर पैनी नजर रखता हूँ,तथा उसके सुन्दर जीवन के निर्माण का प्रयास करता हूँ। साथ ही परिवार के मुखिया के रूप में घर में घटित होने वाली प्रत्येक गतिविधि पर सुबह बिछावन से उठने से लेकर रात में सोने के पहले तक घर काके प्रत्येक कार्य का आकलन करता हूँ।
एक किसान के रूप में प्रतिदिन सुबह उठकर अपने खेतों में जाकर फसल के प्रत्येक बिन्दु का आकलन करता हूँ।इसके साथ ही विद्यालय में भी अपने कार्य का संवहन करता हूँ। इस प्रकार मनुष्य को अपने जीवन का विकास करना हो तो तो जीवन के हर एक क्षण का सदुपयोग करना चाहिए जिससे कि उसको सफलता मिल सके।
भविष्य की बहुत सारी शुभकामनाओं के साथ आपका ही।
आलेख साभार-श्री विमल कुमार "विनोद" शिक्षाविद।

No comments:
Post a Comment