स्कूल का मृत संसार"- आज के संदर्भ में- श्री विमल कुमार" विनोद" - Teachers of Bihar

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Sunday, 1 January 2023

स्कूल का मृत संसार"- आज के संदर्भ में- श्री विमल कुमार" विनोद"

शिक्षा की आवश्यकता प्रारंभ से ही रही है क्योंकि विश्व की सारी  समस्याओं की जननी अशिक्षा ही रही है।अतः प्राचीन काल से ही लोगों में पढ़ने की ललक रही है जिसके लिये लोग ऋषि मुनि के आश्रम में शिक्षा ग्रहण करने के लिये जाते थे जहाँ उन्हें वेद, उपनिषद,धर्म,संस्कार,वेदान्त, गीता,सांख्य,धनुष विद्या,शास्त्रार्थ नैतिकता,योग,गुरू भक्ति,चरित्र निर्माण इत्यादि की शिक्षा मुफ्त में दी जाती थी।लेकिन जैसे-जैसे लोगों का विकास होने लगा वैसे ही शिक्षा के क्षेत्र में निजी विद्यालय को बढ़ावा दिया जाने लगा।साथ ही शिक्षा को मुफ्त में दिये जाने के जगह पर इसे शिक्षा माफियाओं ने धन कमाने का चरागाह समझ लिया ,जिसके तहत मिशनरी संस्थाओं ने भी तरह-तरह के नाम से विद्यालय खोल कर लोगों को अपनी ओर आकर्षित कर रिझाने का प्रयास  किया ।

" स्कूल का मृत संसार"जो कि ब्राजील के एक रोचक व्यक्ति और अदभुत तर्कशीलता और नैतिकता के गुणों से संपन्न क्रांतिकारी विचारक 'ईवान इलिच' जिनका जन्म वियेना में 1926 में हुआ था की सोच थी। शिक्षा के क्षेत्र के क्रांतिकारी विचारक ईवान इलिच को भारत की सुप्रसिद्ध संस्था ICSSR ने    19 नवम्बर से16 दिसम्बर 1972 की अवधि में डाॅक्टर ईवान इलिच को भारत आने का निमंत्रण मिला था और वे वनस्थली विद्यापीठ, शांति निकेतन,गाँधी ग्राम और बनारस गये थे,वहीं उनके चुपके से दिल्ली के जामा मस्जिद के पास के एक सरकारी विद्यालय को भी देखने का भी मौका मिला था जहाँ उनको लगा कि भारत में शिक्षा देने के लिये जिस स्कूल की स्थापना की गई है, एक प्रकार से जाति व्यवस्था का उदात्तीकरण करता है;वह एक जन्म पर आधारित विभाजन की जगह 'ऊँची' और'नीची कक्षा या  डिग्री के नाम पर समाज का विभाजन करता है।

इन्होंने आगे लिखा है कि अधिक तालीम समेट चुके अमीर बच्चों की स्पर्धा में ये गरीब बच्चे कहीं नौकरी नहीं पा सकेंगे।'कर्म का सिद्धांत भी आखिरकार अमीरों के पक्ष में ही जाता है। मेरा यह आलेख"स्कूल का मृत संसार"आज के संदर्भ में भी वास्तविकता की धरती पर देखने में खरा उतरता है क्योंकि-

(1)निजी विद्यालयों में जहाँ कि विद्यार्थियों को शिक्षा प्राप्त करने में बहुत मोटी रकम खर्च करना  पड़ता है,वैसी स्थिति में सिर्फ धनाडय लोगों के घरानों तक ही उत्कृष्ट प्रकार की शिक्षा सिमटी हुई नजर आती है। जबकि सरकारी विद्यालयों में विद्वान शिक्षकों की कमी नहीं है।

(2)आज जब लोक प्रशासन जन्म के पहले से लेकर मृत्यु के बाद तक  अपनी भूमिका निभाता है वैसी स्थति में सरकार के द्वारा विधार्थियों के लिए बहुत सारी कल्याणकारी योजनाओं को चलाया जा रहा है।

(3)इन कल्याणकारी योजनाओं के आदेश लागू होते ही ,इसका बंदरबाट तथा लूटने का धंधा कार्यालय से विद्यालय तक प्रारंभ कर दी जाती है।

(4)विद्यालय में चाहे विद्यालय प्रधान,लिपिक या विद्यालय विकास समिति के अध्यक्ष, सदस्य हों सारे लोगों की बुरी नजर उक्त सरकारी कल्याण निधि पर रहती है,जो कि विद्यालय के शोषण का एक प्रमुख अंग माना जाता है।

(5)विद्यालय में विद्यार्थी जब अपना किसी काम के लिये आते हैं तो प्रत्येक काम के लिये खुश बख्शी के नाम पर दक्षिणा की माँग संभवतः विद्यालय प्रधान तथा कार्यालय प्रधान के द्वारा की जाने लगती है।

( 6)विद्यालय में चाहे रजिस्ट्रेशन हो या फार्म भरना हर कदम पर कार्यालय खर्च के नाम पर अधिक रूपये की मांग आज विद्यालय प्रशासन की नियति सी हो गई है।

( 7)विद्यालय प्रबंध समिति के लोग भी प्रतिदिन विद्यालय में जाकर  शिक्षा में गुणवत्ता नहीं बल्कि  विद्यार्थी को मिलने वाली योजनाओं में अपने कमीशन की बात ही सोंचते हैं।

   बड़ी दुर्भाग्य कि बात है कि जो विद्यालय प्रधान विद्यालय में चली आ रही रूपये लेनदेन की प्रथा को रोकने का प्रयास करते हैं उसको कार्यालय के लिपिक का कोपभाजन बनना ही पड़ेगा।

  इस प्रकार हम जहाँ एक ओर निजी विद्यालयों को शिक्षा माफिया के रूप में लूट का साधन मानते हैं,वहीं दूसरी तरफ सरकारी विद्यालयों में जहाँ पर गरीब ,मध्यमवर्गीय परिवारों के वैसे विद्यार्थी जिनके माता पिता मजदूरी करके बच्चों को पढ़ने के लिये भेजते हैं ,एक घृणित कार्य प्रतीत होता है। चूँकि विद्यार्थियों के अविभावकों को भी लगता है कि विद्यालयों में बिना खुशबख्शी के मेरा काम नहीं हो पायेगा,इसलिए आदतन भी अवैध रूपया देते हैं।

 इसके लिए सरकार को भी चाहिए कि विद्यालय में अन्य खर्च के लिये दिये जाने वाली  राशि को खर्च के हिसाब से अधिक दिया जाना चाहिये।

    इस प्रकार मुझे ऐसा लगता है कि आज के समय में निजी विद्यालय के साथ-साथ सरकारी स्कूलों में भी विद्यार्थी को लूटने का प्रयास किया जाता है ,जहाँ कि हम कह सकते हैं-

(1)सिखाने और सीखने हेतु जिम्मेदारी को बदलो।

(2)शिक्षा को व्यवसायिक दर्जा न दो।

(3)शिक्षा संस्थाओं को सुविधा केन्द्र का स्वरूप अपनाना चाहिए

(4)विद्यार्थीयों की उपस्थिति को अनिवार्य मत बनाओ क्योंकि यह उनके मुक्त असेम्बली का विरोधी है।

(5)कुशल व्यक्ति को ऐसे प्रोत्साहन प्रदान करो ताकि वे अपने ज्ञान को और लोगों में बाँट सके।

(6) एक कुशल और सीखने में रूचि रखने वाले व्यक्ति के लिये वह प्रत्येक कुशलता प्राप्त करना संभव है जिसे वह चाहता है।

   अंत में हम कह सकते हैं कि निजी तथा सरकारी स्तर पर आज विद्यार्थी तथा अविभावक का काफी दोहन किया जा रहा है, इसलिए "सकूल का मृत संसार" आज भी शिक्षा के क्षेत्र में झलकती है।

 


आलेख साभार-श्री विमल कुमार" विनोद" 

शिक्षाविद।

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