एक राजनीतिक विश्लेषक की लेखनी से। भारत के साथ-साथ विश्व में सरकार के तीन अंग होते हैं-
(1)विधायिका-जिसका कार्य कानून बनाना,
(2)कार्यपालिका-विधायिका के द्वारा बनाये गये कानून को लागू करना तथा
(3)न्यायपालिका-कानून को लागू करने में कार्यपालिका का सहयोग करना तथा कानून का उल्लंघन करने वाले को दंडित करना है।
भारतीय संविधान के अंतर्गत सरकार के तीनों अंग क्रमशः विधायिका,कार्यपालिका तथा न्यायपालिका एक दूसरे से जुटे हुये हैं। दूसरी ओर संयुक्त राज्य अमेरिका में जहाँ पर Montesque के द्वारा दिये गया "The Seperation of Power"का सिद्धांत पाया जाता है जहाँ पर विधायिका,कार्यपालिका तथा न्यायपालिका (राष्ट्रपति,कांग्रेस तथा सर्वोच्च न्यायालय) एक दूसरे से हटी हुई है तथा यहाँ पर अवरोध एवं संतुलन(Checks and Ballance)का सिद्धांत पाया जाता है जिसके कारण कोई एक दूसरे के क्षेत्राधिकार का उल्लंघन न कर सके।
भारत में विधायिका,कार्यपालिका तथा न्यायपालिका एक दूसरे से जुटी हुई है।क्योंकि संसद कानून बनाती है,राष्ट्रपति जो कि भारतीय कार्यपालिका का प्रधान होता है तथा न्यायिक व्यवस्था के शीर्ष पर अवस्थित सर्वोच्च तथा उसके नीचे अवस्थित न्यायालय स्वतंत्र एवं निष्पक्ष न्याय देने तथा कानून का उल्लंघन करने वाले को सजा देने का काम करते हैं।
मेरा यह आलेख जो कि संवैधानिक उपबंधों तथा कभी- कभी विधायिका,कार्यपालिका तथा न्यायपालिका के बीच उत्पन्न हुये आपसी प्रतिस्पर्धा तथा एक दूसरे के क्षेत्राधिकार के उल्लंघन किये जाने की स्थिति में संवैधानिक तथा प्रशासनिक अराजकता की स्थिति उत्पन्न कर देती है जो कि देश की कानून व्यवस्था को संतुलित करने में परेशानी का मुख्य कारण बन जाती है। जैसा कि सर्वविदित है कि भारत में लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था है, जहाँ पर वयस्क मताधिकार के अंतर्गत वैसे भारतीय नागरिक जिन्होंने 18 वर्ष की आयु प्राप्त कर ली है ,बिना किसी जाति,धर्म, लिंग,वंश,पेशा,जन्म स्थान का भेदभाव किये ही चुनाव में भाग लेकर अपने जनप्रतिनिधि को चुनते हैं,जो लोकसभा तथा विधानसभा में जाकर देश की शासन व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने के लिए कानून बनाने का कार्य करते हैं जो कि देश की जनता के हित में होता है। कानून बनाते समय इस बात का ख्याल रखा जाता है कि संसद कोई भी ऐसा कानून नहीं बना सकती है, जो कि संविधान की सर्वोच्चता तथा गरिमा को आघात पहुँचाता हो।यदि ऐसा होता है तो देश का सर्वोच्च न्यायालय अपने न्यायिक पुनरविलोकन(Judicial Review)के अंतर्गत संसद के द्वारा बनाये गये कानून को अवैध घोषित कर सकती है।
दूसरी बात यह है कि M•L•A या M•Pजो कि जनप्रतिनिधि के रूप में काम करते हैं,जनता के दुःख, दर्द को सुनना उनका परम कर्तव्य माना जाता है,क्योंकि आखिर जनता अपनी समस्याओं के समाधान के लिये आखिर जाये तो कहाँ जाये।
एक राजनीतिक चिंतक होने के नाते मुझे ऐसा महसूस होता है कि देश कि किसी भी समस्या का समाधान आपस में मिल बैठकर निकाला जाना चाहिये।किसी एक को खुश करने तथा उसके नजर में अपनी सर्वोच्चता दिखाने के लिये यदि विधायिका के सदस्य कार्यपालिका पर अनावश्यक रूप से धौंस जमाने का प्रयास करे तो निश्चित रूप में विधि-व्यवस्था बनाये रखने में अराजकता तथा प्रशासनिक संकट उत्पन्न हो जायेगी। ऐसा भारतीय लोकतंत्रात्मक शासन प्रणाली में सामर्थ्यवान छवि वाले जिनको जनता ने अपने जनप्रतिनिधि के रूप में चुनकर भेजा है,तथा उनके समर्थक से अनेकों बार कार्यपालिका के पदाधिकारी तथा अन्य कर्मियों पर उनको,निलंबन या बर्खास्त कर देने की धमकी देने से बाज नहीं आते हैं,फिर ऐसा क्यों न हो, आखिर सरकार तो उनकी है जहाँ से संपूर्ण भारतवर्ष के लिये उनके आलाकमान के द्वारा शासन की बागडोर को चलाया जाता है।
अब कुछ कानून संगत तथ्य जिसके द्वारा देश की शासन व्यवस्था चलायी जाती है जहाँ पर कि यदि अपनी माँगों के लिये धरणा देने की बात होती है तो ,उसके लिये धरणा स्थल निर्धारित किया जाता है,साथ ही जब कोरोना वायरस के संक्रमण के काल में जिससे भारत के साथ-साथ संपूर्ण विश्व परेशान है,जहाँ सामाजिक दूरी बनाकर रहने की चेतावनी दी जा रही है तथा जगह-जगह पर 144 धारा लागू कर दी गई है,वैसे समय में अपने दल-बद के साथ प्रखंड,समाहरणालय या सरकारी परिसर में अपनी माँगों के समर्थन में जाकर उनके वरीय पदाधिकारी पर दबाव डालने का अथक प्रयास करना मुझे लगता है कि सरकार के एक अंग का दूसरे अंग के क्षेत्राधिकार का उल्लंघन माना जा सकता है।
जनप्रतिनिधि के सदस्यों को आचार संहिता के बाहर जाकर निकाय के अंतर्गत विशेषाधिकार का प्रयोग जैसे प्रशासनिक महकमें में दबाव बनाना अपराध की श्रेणी में आता है।प्रशासन को स्वविवेक से अपना काम करने की आजादी दी जानी चाहिये।पुलिस विभाग कानून को लागू करने वाली अभिकरण है। कानून के मुताबिक यत्र-तत्र धारणा देने से उत्तेजना पैदा होने की संभावना बनती है।विधायिका के द्वारा ही कार्यपालिका तथा न्यायपालिका को शक्ति का क्रियान्वयन तथा अनुपालन की शक्ति प्राप्त होती है।
जहाँ तक आपदा प्रबंधन कानून 1856 तथा 2013 के द्वारा केंद्र सरकार को विशेष शक्ति प्रदान करते हुये अधिकार दिया गया है कि यदि आपदा की स्थिति में राज्य(प्रांतीय)सरकारें आपदा से निपटने में असमर्थ नजर आती है तो केन्द्र सरकार वहाँ आपातकाल की घोषणा कर व्यवस्था को सुदृढ़ बनाने का प्रयास करेगी।
अंत में राजनीति चिंतक होने के नाते मेरा यह मानना है कि विधायका,कार्यपालिका तथा न्यायपालिका को अपने-अपने क्षेत्रों में कानून के दायरे में रहकर कार्य करना चाहिये तथा न्यायपालिका जो कि कानून का उल्लंघन करने वाले को दंडित करने का प्रयास करती है,जो कि स्वतंत्र एक निष्पक्ष रूप से काम कर रही है उसको प्रोत्साहित करना ,प्रत्येक भारतीय नागरिक का परम कर्तव्य है।साथ ही "कानून बनाने वाला ही अगर कानून का उल्लंघन करते हैं तो यह किसी भी समाज तथा देश के लिये बहुत बिडंबना की बात है।
इसलिये सरकार के किसी भी अंग को एक दूसरे के कार्य क्षेत्र में अनावश्यक रूप से दखलंदाजी नहीं देनी चाहिये,जिससे किसी प्रकार प्रशासनिक तथा संवैधानिक रूप से अराजकता की स्थिति पैदा होने की संभावना बने।
आलेख साभार-श्री विमल कुमार "विनोद"शिक्षाविद।

No comments:
Post a Comment