रेणु की धरती पर जहाँ धूल भी है, फूल भी तथा शूल भी, उसी धरती पर परती परिकथा' तथा 'मैला आँचल' तथा उनकी प्रसिद्ध कथा 'मारे गए गुलफाम' की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए कोसी की अभिशप्त धारा ने एक और लाल प्रो. (डॉ.) सुरेंद्र प्रसाद साह को फारबिसगंज से सटे सोनापुर बाजार की धूसर जमीन पर पग-पग आगे बढ़ाते हुए, अपने आँचल की छांव में पालित किया।
उनका बचपन अभाव में बीता, तो पिता के साये से भी ईश्वर ने अल्पायु में ही वंचित कर दिया। फिर क्या था, इस असहाय तथा निर्बल परिवार से पिता के भाइयों ने भी मुँह फेर लिया। शिक्षा के प्रति जिज्ञासा ही उनकी जिजीविषा बन गई और फिर कोई भी बाधा उनके आगे टिक न सकी। तत्कालीन मैट्रिक की परीक्षा में आर्टस लेकर उन्होंने प्रथम श्रेणी में सफलता पाई।उस समय कला विषयों प्रथम श्रेणी में पास होना हिमालय चढ़ने सदृश समझा जाता था। फिर स्नातक ऑनर्स (हिंदी) की परीक्षा में डी.एस. कॉलेज, कटिहार से भागलपुर विश्वविद्यालय में उन्होंने प्रथम स्थान उस समय प्राप्त किया जिस समय भागलपुर विश्वविद्यालय का क्षेत्र लगभग आधे बिहार के बराबर था। आज के ललित नारायण विश्वविद्यालय, भूपेन्द्र नारायण मंडल विश्वविद्यालय, पूर्णियां विश्वविद्यालय, मूझगेर विश्वविद्यालय तथा झारखंड के सिद्धु-कान्हू विश्वविद्यालय, भागलपुर विश्वविद्यालय से हीं विखंडित होकर अस्तित्व में आए हैं। इस विशाल विश्वविद्यालय से प्रथम स्थान प्राप्त करना, सोनापुर जैसे ग्रामीण परिवेष के छात्र के लिए गौरव की बात थी। पर पिता का साया नहीं रहने के कारण ट्यूशन पढाकर अपने जरुरत को पूरा करना हिमालय पर फतह करने जैसा कठिन था। स्नातकोत्तर की शिक्षा प्राप्त करने के लिए मित्रों की आर्थिक सहायता से भागलपुर विश्वविद्यालय के स्नातकोत्तर हिंदी विभाग में दाखिला लिया और शिक्षा को ही अपनी समस्त सांसारिक विपदाओं से पार पाने का शस्त्र बना लेने की ठान चुके सुरेंद्र बाबू के कदम कभी डगमगाए नहीं। उनकी प्रत्येक कहानी पारिवारिक एवं सामाजिक घटनाओं की पृष्ठभूमि से है, जिसमें पाठक यूँ खो जाता है कि उसे लगता है कि यह तो उसकी ही कहानी है। पिता के खोने का दर्द, सामाजिक कुरीतियों पर शब्दों के कुठाराघात, महाजनी के चंगुल में कसमसाता सीमांत किसान, लड़कियों की स्वतंत्रता या सामाजिक प्रतिबंध आदि उनकी कहानियों की प्रमुख विषय-वस्तु रहे हैं। डॉ. राधाकृष्ण सहाय के शब्दों में "कहानीकार सुरेंद्र प्रसाद साह के पास एक जोड़ी आँख है और हाथ में एक कलम। दृष्टिसंपन्न आँख मानवीय अस्तित्व के नाटक के विभिन्न दृश्यों को भेदती और देखती चलती है तो कलम सहज ढंग से देखे परखे समझे दृश्यों को शब्दबद्ध करती चलती है।"
डा0 सुरेन्द्र प्रसाद साह नेपाल के सीमावर्ती क्षेत्र के निवासी थे, इस नाते नेपाली भाषा के प्रति लगाव उन्हें बचपन से ही था, जबकि हिंदी विषय के ही वे प्रोफेसर भी थे। हिंदी तथा नेपाली भाषा के वे अधिकारी विद्वान थे। इस बात का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि सर्वप्रथम इन्होंने अर्थविज्ञान की दृष्टि से दोनों भाषाओं में प्रयुक्त शब्दों का तुलनात्मक अध्ययन कर इस विषय पर पी-एच.डी. की उपाधि पाई। बाद में उन्होंने हिंदी एवं नेपाली भाषा' नामक पुस्तक लिखी। तत्पश्चात् उन्होंने नेपाली भाषा के चार उत्कृष्ट उपन्यासों 'सुम्निमा, 'नित्रसेन', 'नया क्षितिज को खोज' और 'बह्मपुत्रका छेऊ-छाऊ साहित्य का हिंदी में अनुवाद किया। जिनमें दो उपन्यास नया क्षितिज को खोज और ब्रह्मपुत्र का छेऊ-छाऊ, साहित्य अकादेमी द्वारा पुरस्कृत उपन्यास हैं।
जिन आर्थिक आघातों से जूझकर उन्होंने अपने जीवन को निखारा और फिर अपना ही नहीं, बल्कि भाई बहन तथा समाज के श्रमशील छात्रों को भी तन मन धन से सहयोग कर एक सम्मानजनक स्तर पर ला खड़ा किया, वह अनुकरणीय है। अपने सफल निर्देशन में उन्होंने कई छात्रों की डॉक्टरेट की उपाधि दिलाई। सेवानिवृति के बाद भी उनके कदम नहीं रुके और अररिया जिला उपभोक्ता न्यायालय में सदस्य न्यायाधीश के पद की गरिमा को भी उन्होंने बढ़ाया। पर कहते हैं कि ईश्वर को भी सद्गुणों से युक्त मानव की आवश्यकता होती है। वर्ष 2005 में वे एक भरा-पूरा शिक्षित एवं सफल परिवार छोड़ गए। स्नातकोतर की परीक्षा प्रथन श्रेणी में पास करने के उपरांत उन्होंने भारतीय डाक विभाग एवं बिहार सरकार में सप्लाई इंस्पेक्टर की नौकरी की। परंतु जिसे नियति ने वाकदेवी की आराधना के लिए सृजित किया हो, वो भला इन नौकरियों में कब तक टिकते। फिर विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के द्वारा चुने गए तथा भागलपुर विश्वविद्यालय में व्याख्याता पद पर नियुक्त हुए। फिर तो उनके हौसलों के पंख उड़ते ही रहे, कभी रुके नहीं, कभी थके नहीं और शिक्षा के क्षेत्र में तथा हिंदी भाषा को समृद्ध बनाने में उनका योगदान चिरस्थायी हो गया।नेपाली भाषा तथा हिंदी भाषा के भाषा-विज्ञान पर तुलनात्मक शोध- ग्रंथ आज भी भाषा-प्रेमियों के बीच लोकप्रिय है। गाँव में अपनी माँ तथा छोटे भाई एवं असमय विधवा हुई छोटी बहन के प्रति सदैव जिम्मेदारी से समर्पित रहे, जो आज भी एक उदाहरण एवं अनुकरणीय है। सभी संतानों की शिक्षा एवं सफलता के पीछे उनका ही मार्गदर्शन तथा आशीष रहा है। चूंकि श्री सुरेंद्र बाबू, 'रेणु' की धरती की उपज थे, अतः उनकी कहानियों में सजीवता है, सहजता है तथा सारे पात्र उनके इर्द-गिर्द के ही हैं। उनकी कथाओं का घटनाक्रम भी यथार्थ से है। आज उनके उपवन को उनकी धर्मपत्नी(उनके ही शब्दों में उनकी प्रत्येक रचना की प्रथम पाठिका) श्रीमती सुनीता साह ने उसी कर्मठता से अपने आँचल में सहेज रखा है। यद्यपि उनके जीवन काल में उन्हें वह सम्मान नहीं मिला, जिसके वे हकदार थे, परंतु यह भी सत्य है कि हिंदी भाषा का इतिहास, बिना उनकी चर्चा के कभी पूरी नहीं हो सकता। आशा है कि समय उनका सम्यक् मूल्यांकन अवश्य करेगा।
विनोद कुमार
मुख्य सेनानायक
रेपिड एक्शन फोर्स
अलीगढ।


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