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Wednesday, 23 September 2026

जुड़वा बहनों की नज़ाकत

 

हिंदी भाषा की अपनी एक ख़ासियत होती है कि जैसे वह लिखी जाती है, वैसे ही पढ़ी जाती है; जैसे वह बोली जाती है, वैसे ही लिखी जाती है। भाषा कौशल की दृष्टि से दुनिया की कोई भाषा इतनी उत्कृष्ट नहीं है। हां,अरबी भाषा में भी पढ़ने-लिखने में परिशुद्धता (Accuracy) है जो जिस तरह कोई चीज़ लिखी जाती है, वैसे ही वह पढ़ी जाती है क्योंकि उसमें ज़बर ( زیر ), ज़ेर ( زبر), पेश (پیش), उल्टी पेश ( ‌الٹی پیش ), खड़ा ज़बर(    کھڑا زبر   ), तशदीद ( تشدید ) और जज़म ( جزم), मद ( مد ), तनवीन (تنوین) आदि एराब ( اعراب ) का इस्तेमाल होता है।  बिना एराब के अरबी नहीं पढ़ी जा सकती, और धार्मिक ग्रंथ: कुरान- हदीस तो बिल्कुल ही नही है क्योंकि थोड़ी-सी गलती से अर्थ का अनर्थ हो जाएगा। अरबी अरब लोगों की अपनी ज़बान है तो वे संदर्भ एवं सूझ-बूझ से बिना एराब के भी पढ़ लेते हैं, ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार लोग उर्दू पढ़ लेते हैं। उर्दू में भी एराब तो है लेकिन आम तौर से उसका इस्तेमाल अमुमन नहीं होता है। यही कारण है कि बिहार (بہار) को बहार (بہار) या बुहार (بہار) भी पढ़ा जा सकता है। तीनों एक ही जैसा है। अब किसी शब्द को क्या पढ़ा  जाना है तो उसे संदर्भ एवं अर्थ के अनुसार सही ढंग से पढ़ा जाता है। जब हम किसी शब्द को पढ़ते हैं तो वह शब्द नज़रों के सामने आते ही, जो मस्तिष्क में एक भाषाई क्रम बना हुआ होता है कि कौन शब्द के बाद कौन-सा शब्द आ सकता है और कौन-कौन से शब्द सार्थक वाक्य पूरे कर सकते हैं तो उसी हिसाब से किसी भी शब्द को पढ़ लिया जाता है। उसकी समझ मस्तिष्क में एक छवि के रूप में होती है। समझिए कि केवल हम देखकर किसी शब्द को नहीं पढ़ते हैं बल्कि दिमाग़ से पढ़ते हैं। उदाहरण के तौर पर राम आम —-- है। आगे हम बिना देखे ही पढ़ पाएंगे कि राम आम खाता है, नहीं कि राम आम आता है और नहीं कि राम आम जाता है।

     अंग्रेजी में तो और अजब- गजब है कि बी यू टी, बट (But) और पी यू टी, पुट (Put) पढ़ा जाता है, जबकि हिंदी में यह गलती नहीं हो सकती क्योंकि सभी मात्राओं की ध्वनि (स्वर) अलग-अलग होती है जो व्यंजन के साथ लग कर अलग-अलग प्रकार से उच्चारित होती है, ध्वनि निकालती है। अंग्रेजी वर्णमाला में 26 अक्षर होते हैं लेकिन उसकी आवाज़ (Sound) 44 होते हैं । सभी स्वर वर्ण का अलग-अलग साउंड होता है जिसे व्यंजन वर्ण के साथ लगाकर उच्चारित किया जाता है। फिर लिखा जाता है। अब देखिए। 'A' का उच्चारण अ, आ, ए, ऐ होता है। कोई एक ध्वनि नहीं निकलती, कोई एक उच्चारण नहीं होता। यही कारण है कि हैट (Hat) को ' हाट' या 'हट' भी पढ़ा जा सकता है लेकिन संदर्भ के अनुसार शब्द परिभाषित होते हैं और वे अर्थ पूर्ण होते हैं। मस्तिष्क में बनी जो छवि होती है,वह किसी शब्द को सही-सही पढ़ने में मार्गदर्शन करती है। जो ग़लतियां उर्दू,अंग्रेजी या अन्य भाषाओं में होती है, वह ग़लती हिंदी भाषा में नहीं होती है। कारण है: सटिक लेखन एवं सटीक पठन, बिल्कुल हु-बहू।

      हिंदी भाषा तो अपने आप में समृद्ध है लेकिन कुछ मामले में उर्दू तथा अंग्रेज़ी के पास ज़्यादा ऑप्शन है। उदाहरण के तौर पर राज और राज़, जलील और ज़लील,सब और शब। यदि हिंदी में एक ही ‘ज’ है तो उर्दू में 5 ‘ज’ हैं: जीम ( ج ), ज़ाल ( ذ ), ज़े ( ز ), ज़ाद ( ض ) और  ज़ो ( ظ ) । यदि हिंदी में ‘स’,’श’ तथा ‘ष’ हैं तो उर्दू में सीन ( س ), शीन ( ش ), से ( ث ) और साद ( ص ) हैं। यदि हिंदी में एक ही ‘ग’ हैं तो उर्दू में दो: गाफ़ ( گ ) और ग़ैन ( غ ) हैं। हिंदी में एक ‘ख’ है तो उर्दू में दो हैं: ख ( کھ ) ख़े ( خ)। इनसे शब्द बनते हैं: खेल ( کھیل ) और ख़्याल ( خیال )। किसी शब्द में जो तल बिंदु लगता है, यह बाद की चीज़ है जो उर्दू तलफ़्फ़ुज़ (उच्चारण) का विकल्प देना चाहता है लेकिन कितना दे सकते हैं?

    इसी तरह यदि हिंदी में एक ‘ज’ है तो अंग्रेजी में J S X Z हैं। हिंदी में एक ‘क’ है तो अंग्रेजी में C K Q हैं। ये अंग्रेजी को लचीला बनाते हैं‌। इस तरह उच्चारण के मामले में हिंदी का स्कोप उर्दू और अंग्रेज़ी के बनिस्पत थोड़ा कम समझ में आता है। हिंदी गज़लों का चलन ने तल बिंदु को जन्म दिया है। फ़िल्मी दुनिया में संवाद और शायरी उर्दू के तलफ़्फुज़ की नज़ाकत के बिना नहीं चल सकते क्योंकि उर्दू तलफ़्फुज़ की अदायगी में एक अलग कशिश है,असर है। महफ़िलों में शायरों की परवरिश, क़ाबिलियत और तहज़ीब व अदब, उसके तलफ़्फुज़ से पता चलता है। खैर, कोई बात नहीं है‌। डॉ.नामवर सिंह ने कहा है कि हिंदी और उर्दू दोनों, जुड़वा बहने हैं। दोनों ही एक ही मां की कोख से जन्म ली है। लगभग समय भी उत्पत्ति का एक ही है। उर्दू और हिंदी एक ही पेड़ की दो डालियां हैं। हिंदी और उर्दू बोलचाल के स्तर पर मूल रूप से एक ही भाषा हिंदुस्तानी) हैं, लेकिन इनमें लिपि, शब्दावली और साहित्यिक शैली का मुख्य अंतर होता है। हिंदी देवनागरी लिपि में लिखी जाती है जो बाएं से दाएं चलती है। उर्दू फारसी-अरबी लिपि में लिखी जाती है जो दाएं से बाएं लिखी जाती है। मानक हिंदी में संस्कृत के शब्दों का अधिक प्रयोग होता है। मानक उर्दू में फारसी और अरबी के शब्दों की संख्या अधिक होती है।आम बोलचाल में दोनों भाषाओं के लोग एक-दूसरे को आसानी से समझ लेते हैं। इत्तेफाक से हिंदी के विकास में ज्यादातर मुस्लिम कवियों एवं लेखकों का योगदान रहा है: अमीर खुसरो, मलिक मोहम्मद जायसी, इब्राहिम द्वितीय, रहीम और रसखान आदि। अमीर खुसरो तो जीनियस थे, वे उर्दू, हिंदी और फारसी; तीनों भाषाओं के कर्णधार थे। इसी तरह उर्दू के विकास में हिंदू साहित्यकारों का काफी योगदान रहा है। आधुनिक युग में भी पंडित बृजनारायण चकबस्त,चन्दू लाल सदन और मनोहर लाल कपूर 'तालिब’,जगन्नाथ आज़ाद और गुलज़ार देहलवी शायरों की दुनिया में बड़े नाम रहे हैं। इस तरह से हिंदी और उर्दू मेल-मोहब्बत का पैग़ाम देने वाली भाषा है। लोग हिंदी और उर्दू को मिलाकर बोलते हैं। आप शत-प्रतिशत शुद्ध हिंदी नहीं बोल सकते, उसमें देशज के साथ विदेशज भाषा की भरमार होती है। हिंदी का हाजमा दुरूस्त है। यह सभी भाषाओं को पचा जाती है। इसमें सभी भाषाओं के चयनित शब्दों का समावेश होता रहता है। यह अपनी चादर में सभी भाषाओं की अच्छाइयों को लपेट लेती है। इस मायने में तो हिंदी के पास भी काफी स्कोप है।

                                मो. ज़ाहिद हुसैन 

              प्रधानाध्यापक                     

 उत्क्रमित मध्य विद्यालय मलह बिगहा,चंडी, नालंदा

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