"मदारी"का साधारण अर्थ होता है भालू,बंदर नचाकर अपनी जीविकोपार्जन करने वाला। ऐसे लोग बंदर या भालू को छोटे में किसी से खरीद लेते है तथा उसका पालन पोषण करते हुये उसे जीवन जीने की कलाओं के बारे में शिक्षा प्रदान करते हैं। चूँकि जानवर मनुष्य से ज्यादा समझदार होता है तथा वह समय परिस्थिति को भी पहचानता है।पशु मनुष्य की तुलना में कई गुणा अधिक वफादार होता है तथा वह अपने प्रजाति के साथ-साथ दूसरे प्रजाति के प्रति भी जागरूक होता है।
मनुष्य एक विवेकशील प्राणी होकर भी जरा-जरा सी बात में अपनों को हानि पहुँचाने में भी पीछे नहीं रहता है,साथ ही जरूरत पड़ने पर अपनों का भी गला घोंटने में पीछे नहीं रहता है। लेकिन यदि आप एक कौआ, मैना,बंदर,हनुमान या किसी भी अन्य जीव को मार देते हैं तो उस प्रजाति के अन्य पशु-पक्षी अपनी शक्ति भर इसका प्रतिरोध करने का प्रयास करता है।
"मदारी"जिसका काम है भालू या बंदर नामक जंगली पशु को पकड़ कर अपने वश में करते हुये अपने बताये गये इशारों पर किसी भी काम को करने के लिये कहना जिसे उस जानवर को करना पड़ता है। मनुष्य भी एक विवेकशील प्रा णी है जिसे जन्म के बाद से ही उसके माता-पिता उसमें सुन्दर-सुन्दर संस्कार,नैतिकता,अनुशासन, शिक्षा इत्यादि का विकास करने का प्रयास करते हैं।
"शिक्षक"जो कि एक राष्ट्र निर्माता होता है,पूरी जिन्दगी परिवार, समाज,विद्यालय में रहकर बच्चों को नित्य नयी संस्कार देने का प्रयास करता है।परिवार से लेकर विद्यालय तक बच्चों को बैठने, खड़ा होने,पढ़ने-लिखने,जीवन की ऊँचाईयों तक बढ़ने तथा जीवन के हर मोड़ में तरक्की करने का ज्ञान बाँटते रहते हैं।विद्यालय में जाकर शिक्षक एक"मदारी"की तरह बच्चों के अंदर तरह-तरह के कला का विकास कराते हुये उसमें तरह-तरह के हुनर का विकास कराने का प्रयास करते हैं।जिस तरह"मदारी"बंदर को जो कहता है,वही वह सुनता है तथा जैसे ही नाचने,प्रणाम करने,शादी की बात करने तथा अन्य बातों को सीखाता है,वैसे ही बंदर तथा भालू अपना काम करता है।शिक्षक भी एक"मदारी"की तरह होता है जो कि बंदर तथा भालू की तरह ही बच्चे-बच्चियों को भी जीवन में कौशल का विकास कराता है,रोजगार के अवसर को विकसित कराने के लिये भी प्रयास करता है।जिस प्रकार "मदारी"बंदर तथा भालू को इस प्रकार से शिक्षा दिये रखता है कि वह जिस प्रकार का खेल दिखाने के लिये कहता है,उसी प्रकार का खेल वह दिखाता है अर्थात उसे बहुत अच्छी तरह से हर चीज को समझाया जाता है।
"मदारी"की तरह शिक्षक को भी अपने शिष्यों को भी प्रत्येक चीज के बारे में गहनता के साथ समझाना चाहिये,ताकि जब भी जो चीज के बारे में पूछा जाय उसे वह तुरंत बता दे।साथ ही जब भरी सभा में"मदारी"बंदर तथा भालू को जो भी काम करके दिखाने को कहता है,वह दिखा कर खुश कर देता है,वही काम विद्यार्थियों को भी वर्ग कक्ष या विद्यालय में शिक्षक के द्वारा किसी काम को करने को कहे जाने पर उनके शिष्यों को करके दिखाना चाहिये ताकि शिक्षक तथा उनके विद्यालय की मान-मर्यादा बनी रह सके।
अंत में,इस आलेख के माध्यम से लेखक ने"मदारी"जो कि बंदर या भालू को जो कि एक जंगली जानवर है,जिसे प्रेम से वश में करकर उसे शिक्षा देने का प्रयास किया है तथा उसमें एक कौशल
(हुनर)का विकास कराकर जीविकोपार्जन कराने का प्रयास किया है,जिससे उस"मदारी"के परिवार तथा स्वंय उस पशु का जीवन यापन संभव हो पाता है,उसी प्रकार शिक्षक को भी अपने शिष्यों का सर्वांगिन विकास कराकर उसके जीविकोपार्जन कराने का प्रयास करना चाहिये।
आलेख साभार-श्री विमल कुमार "विनोद"प्रभारी प्रधानाध्यापक राज्य संपोषित उच्च विद्यालय पंजवारा,बाँका(बिहार)।


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