"भूख"--एक लघुकथा- श्री विमल कुमार"विनोद" - Teachers of Bihar

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Sunday, 27 November 2022

"भूख"--एक लघुकथा- श्री विमल कुमार"विनोद"

पृष्ठभूमि-03 जुलाई 2018 के दिन के पाँच बजे का समय, एक भीड़ भरे सड़क के किनारे कूड़ा दान के पास एक भूखा व्यक्ति जो कि कूड़ादान से सड़ा-गला भोजन निकाल कर पेट की क्षुधा मिटाने को मजबूर है,की लघुकथा,श्री विमल कुमार "विनोद"की प्रस्तुति।

"भूख"जिसका मुख्य कारण है शरीर में ग्लूकोज की कमी जिससे आंत में सिकुड़न होने लगती है और लोग कुछ अन्न प्राप्त कर पेट की क्षुधा मिटाने को परेशान रहता है।

"भूख"लघुकथा जो कि जीवन की वास्तविकता पर आधारित है।एक दिन की बात है कि एक भव्य अपार्टमेंट के पास एक कूड़ादान रखी हुई थी जहाँ पर एक व्यक्ति जो कि मानसिक रूप से विक्षिप्त नजर आ रहा था।चेहरा अस्त-व्यस्त सा लग रहा था।वह व्यक्ति उस कूड़ेदान के  पर पड़ी पत्तल को चाट रहा था। साथ ही उसके कपड़े गंदे से लग रहे थे। वह भूख से परेशान नजर आ रहा था तथा अपने पेट की क्षुधा को तृप्त करने के लिये परेशान नजर आ रहा था।इतने में देखा कि उसकी नजर एक चमचमाती सड़क के किनारे रखे कूड़ादान की ओर जाती है,जहाँ भूख से परेशान वह व्यक्ति वहाँ रखे कूड़ादान से सड़ा गला भोजन निकाल कर खाने लगता है और जब तक वह संतुष्ट नहीं होता है,तब तक वह उस भोजन को बिना कुछ सोचे समझे खाता ही जा रहा था। 

इसे देखकर लेखक के मन में बहुत सारी कल्पना उभर कर आती है कि आखिर इस भूख का क्या कारण है, इस भूख को मिटाया कैसे जा सकता है,क्या इस भूखमरी को परिवार,समाज तथा सरकारी स्तर पर समाप्त किया जा सकता है,क्या किसी व्यक्ति के द्वारा भूख से तड़पना एक विकासशील देश के चेहरे पर एक काला धब्बा तो नहीं है ?

इसी पर लेखक ने अपनी चिंतन का सहारा लेकर इस तरह के भूख से व्याकुल व्यक्ति  के संबंध में चिंतन किया है जो निम्न प्रकार है-

(1) भूख किसी भी व्यक्ति को लग सकती है,लेखक ने जब अपनी सकारात्मक सोच से इस भूखे व्यक्ति के बारे में चिंतन किया तो लगा कि कोई भी व्यक्ति अपने जीवन के शुरुआती दौर में अपने भविष्य के प्रति जब सजग नहीं रहता है तो वह उत्पादन संबंधी कार्य करने में धीरे-धीरे अक्षम सा होने लगता है।साथ ही काम के प्रति उदासीनता होने के कारण वह अपने भोजन के लिये दूसरे पर निर्भर होने लगता है,जो कि जीवन में उसे भूखमरी के कगार पर पहुँचा देता है तथा अपने भूख की क्षुधा को मिटाने के लिये कूड़ादान से सड़ा गला भोजन निकाल कर खाने को मजबूर हो जाता है।

(2)समालोचात्मक ढंग से यदि देखा जाय तो मुझे ऐसा लगता है कि सरकार के द्वारा देश की जनता को रोजगार मुहैया कराकर उसे काम करने के लिये प्रोत्साहित किया जाना चाहिये,न कि मुफ्त में चावल,गेहूँ तथा अन्य प्रकार का भोज्य पदार्थ प्रदान किया जाना चाहिये।

(3)परिवार,समाज के लोगों को भी समाज के बेरोजगार लोगों को रोजगार करने की ओर प्रोत्साहित करने का प्रयास करना चाहिये, ताकि उस व्यक्ति को आगे चलकर भूख से परेशान नहीं होना पड़े।

(4)इसके अलावे मुझे ऐसा महसूस हुआ कि एक बेरोजगार व्यक्ति जिसने अपने जीवन में कुछ भी उपार्जन करने की बात नहीं सोची वह भविष्य में भूखा तथा मानसिक रूप से परेशान होगा ही,क्योंकि जीवन को जीने के लिये रोटी,कपड़ा और मकान की आवश्यकता होती है,जो कि  मेहनत, उँची सोच,सृजनशीलता से ही संभव हो सकता है,और आज मैं जिस भूख से तड़पते व्यक्ति की लघुकथा प्रस्तुत करने जा रहा हूँ,कहीं-न-कहीं अपनी जिंदगी के नाकामयाबी का शिकार है।

इस प्रकार मैंने अपनी सोच को सकारात्मक रूप देते हुये"भूख" लघुकथा को अपनी लेखनी से  लिखकर जीवंत रूप देने का प्रयास किया है,जो कि समर्पित है।


आलेख साभार-श्री विमल कुमार
"विनोद"

प्रभारी प्रधानाध्यापक राज्य संपोषित उच्च विद्यालय पंजवारा,बांका(बिहार)

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