संकट में भारतीय कृषि - श्री विमल कुमार"विनोद" - Teachers of Bihar

Recent

Saturday, 26 November 2022

संकट में भारतीय कृषि - श्री विमल कुमार"विनोद"

भारत एक कृषि प्रधान देश है,जहाँ की लगभग 75%जनसंख्या कृषि पर आधारित है।संसार में प्रत्येक मनुष्य को जीवन जीने के लिये अन्न की जरूरत होती है,जिसके बिना संसार का कोई भी जीव जिंदा नहीं रह सकता है। साथ ही आज जितनी तीव्र गति से जनसंख्या बढ़ रही है,इसके लिये कृषि की उत्पादन क्षमता को भी बढ़ना जरूरी है।इसके लिये किसान को स्वंय प्रयास करना चाहिए तथा सरकार को भी प्रयास करनी चाहिए। 

लेकिन आज के समय में इसमें संकट की काली छाया मंडरा रही है,जो कि संसार के जीवों विशेषकर मानव के लिये एक त्राहिमाम संदेश के रूप में माना जा रहा है,जो इस प्रकार है-

(1)कृषि के प्रति उदासीनता-आज के समय में अधिक-से-अधिक लोगों की मानसिकता हो गयी है,मुफ्त में भोजन प्राप्त करने की,जिसमें कई गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले छोटे- मोटे किसानों को तथा मजदूर वर्ग के लोगों को काम करना चाहिए जिससे उत्पादन बढ़ सके,को मुफ्त में सरकार के द्वारा अनाज तथा रूपया मिल जाने से खेती में काम करने के प्रति उदासीनता दिखाई दे रही है।इसके अलावे ऐसा देखा जा रहा है कि कुछ ऐसे लोगों को भी मुफ्त में अनाज मिल जाता है,जिसकी उसको आवश्यकता नहीं,जो कि राशन की दुकान से उठाकर बाजार में ले जाकर बेच देते हैं।ऐसा होने के कारण एक ओर तो सरकार को सब्सिडी देनी पड़ती है,तो दूसरी ओर लोगों में काम करने की ओर उदासीनता देखने को मिलती है,जो कि आने वाले समय में देश के लिये घातक सिद्ध होता जा रहा है।

इसके सुझाव के तौर पर कहा जा सकता है कि सरकार को इस प्रकार  की सब्सिडी केवल लाचार गरीब लोगों को ही दिया जाना चाहिए,न कि  कल्याणकारी राज्य के रूप में अनावश्यक लोगों को भी"सदाव्रत"के रूप में बांट देना चाहिए।लोगों को कृषि की ओर आकर्षित करने के लिये उत्प्रेरित करना चाहिए।

(2)सिंचाई की समस्या-सिंचाई के प्रमुख संसाधन नदी,झील,जलाशय, कूप,तालाब सभी सूखते जा रहे हैं। नदी से अवैध तथा बिना मानक के बालू का उठाव करके नदियों में गाद जम गये तथा तालाब खेल का मैदान बनकर अपनी तबाही की कहानी को गा रहा है।तालाब को भू-माफिया के द्वारा प्लाटिंग करके बेचा जा रहा है।नदियों से लगातार अवैध बालू का उठाव करके उसे गड्डों में तब्दील किया जा रहा है,जिसके चलते नदियों से निकलने वाले अनेकों डांढ़ जिसका मुहाना उपर हो जाने से सूख गये,जो कि सिंचाई का एक प्रमुख स्त्रोत है।

(3)रासायनिक खाद तथा कीटनाशक के प्रयोग से जमीन की उर्वरा शक्ति पहले तो अधिक लेकिन फिर बाद में कम होने लगती है।साथ ही रासायनिक कीटनाशक का प्रयोग किये जाने से खेतों में पाये जाने वाले केंचुआ तथा अन्य मित्र जीव जो कि भूमि में पाये जाते हैं,नष्ट हो जाते हैं। बहुत दुर्भाग्य की बात है कि केंचुआ जैसे जैविक खाद का उत्पादन करने वाले जीवों को थायमाइट जैसे कीटनाशक देकर मार दिया जाता है।इसके बाद बाजार से जैविक खाद खरीदकर खेतों में डाला जाता है।

इस प्रकार से हम देखते हैं कि भारतीय कृषि पर संकट का खतरा मंडरा रहा है।

(4)पोलीथीन का अंधाधुंध प्रयोग- यह सर्वविदित है कि पोलीथीन न तो सड़ता है,न तो गलता है और न ही नष्ट होता है जो कि भूमि की कोड़ बनकर निगल रहा है।बड़ी दुर्भाग्य की बात है कि आज तक पोलीथीन का प्रयोग बंद नहीं हो पाया तथा इसे बंद करने की नीति टांय-टांय-फिस्स होकर रह गयी।आज के समय में पोलीथीन भूमि को पूरी तरह से निगलती जा रही है,जिसके चलते भारतीय कृषि भीषण संकट के दौर से गुजर रही है।

(5)फसल बीमा की कमी-विश्व में तेजी से हो रहे जलवायु परिवर्तन होने के कारण से अनायास वर्षा तो कभी सूखा होने लगती है,जिससे फसलों को भारी नुकसान होने लगता है।इस कारण से खेतों मेें लगे किसानों के फसल नष्ट होने लगते हैं।बीमा कंपनी तथा सरकार के द्वारा फसल बीमा नहीं कराये जाने के कारण किसानों को आर्थिक क्षति होती है जिससे किसान धीरे-धीरे कृषि कार्य से विमुख होने लगे हैं।

(6)बेरोजगारी-शहरों की ओर पलायन तथा सड़क किनारे जाकर बसने की लालसा के चलते आज लोगों की मानसिकता कृषि कार्य से विमुख होती जा रही है।लोगों को ऐसा महसूस हो रहा है कि अब खेती करने से कोई फायदा नहीं होने वाला है,सड़क किनारे मकान बनाकर कोई रोजगार करने से ही पालन-पोषण हो सकता है।इस कारण से लोग अपनी जमीन को दूसरे लोगों को खेती बारी करने को दे देते हैं।जिसके चलते भी भारतीय कृषि संकटापन्न दौर से गुजर रही है।

इसके अलावे स्थानीय तथा प्रांतीय स्तर पर लोगों को रोजगार नहीं मिल पाने के कारण,मजदूरों का पलायन होने लगता है।इसके चलते भी भारतीय किसानों को खेतों में काम करने के लिये मजदूर नहीं मिल पाता है।

इसके लिये भारतीय कृषकों को कृषि करने की ओर अपनी सोच विकसित करनी होगी।साथ ही सरकार को भी कृषि के क्षेत्र को बढ़ावा देने का प्रयास करना होगा।बैंक द्वारा कृषि के लिये दिये गये ऋण का समय-समय पर पर्यवेक्षण तथा मार्गदर्शन करना होगा तभी भारतीय कृषि के उपर मंडराते संकट को टाला जा सकता है।


आलेख साभार-श्री विमल कुमार "विनोद" 

प्रभारी प्रधानाध्यापक राज्य संपोषित उच्च विद्यालय पंजवारा बांका (बिहार)।

No comments:

Post a Comment