असुरों का संहार करने वाली मां-श्री विमल कुमार"विनोद" - Teachers of Bihar

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Monday, 28 November 2022

असुरों का संहार करने वाली मां-श्री विमल कुमार"विनोद"

 मैथिली कवि विद्यापति जी के द्वारा रचित भगवती वंदना के भाव को श्री विमल कुमार"विनोद"जी अपनी लेखनी से प्रस्तुत करने की कोशिश कर रहे हैं। 

जय-जय भैरवी असुर भयावनी,

पशुपति भामिनि माया,सहज 

सुमति वर दियो है गोसावनी,अनुगत-

गति पाया।

"भैरवी" भगवती का एक नाम है।इस वंदना में भैरवी की जय-जयकार की जा रही है।यह गीत मिथिलांचल के लोग मां दुर्गा के अष्टम रूप महाकाली के पूजनोउत्सव के क्रम में गाया गया है।इस गीत के माध्यम से दर्शाया गया है कि माँ काली असुर को भय दिखाने वाली है,जो किअसुरों के भय से अपने भक्तों को बचाती है जो कि पशुपति की स्त्री (भामिनी) है जिसका एक नाम"माया" भी है। कविवर विद्यापति जी प्रार्थना कर रहे हैं कि" ईश्वरी आप सहजता और सुमति का वरदान दीजिये।अब मैं तुम्हारे शरणागत (अनुगत) हो गया हूँ आप दिन-रात शव के उपर सवार हैं और आपके चन्द्रमणि पाजैब (चन्द्रमा के समान मणि मुक्ता भरा हुआ) को आप धारण किये हुये हैं और इसी श्रृंगारपूर्ण अवस्था में आप दैत्यों को मारकर आप अपने मुख में दबा रखी हैं और कई राक्षसों को तोआपने"कुल्ला"करके फेंक दिया है।

विद्यापति जी के द्वारा रचित इस भगवती वंदना में मां के इस उग्र रूप  का वर्णन है।आपका जो रंग है वह श्याम रंग है और लाल-लाल रंग की आंखें,जिसमें क्रोधाग्नि की ज्वाला धधक रही है और यह रूप जो कि देखने में लग रहा है जैसे श्याम वर्ण पानी के उपर में"लीली" की फूल(फूल कोका)की तरह आपका चेहरा दिख रहा है और इस गुस्सा जैसे आपके होठों से कट-कट की आवाज आ रही है।इस समय माता जी आप इतनी गुस्से में हैं कि आपके होंठ फड़फड़ा रहे हैं। इस कारण से माता के मुख से(लिथूर) खून जो फेंका जा रहा है उससे फोका यानि बुलबुला जो कि फव्वारा निकल रहा है।इसके अलावे आपके पैरों में बंधे नुपुर जो कि धन-धन,हन-हन कर रहा है तथा आपके पैरों में बंधा घुँघरू जो कि तेज नाद(आवाज)उत्पन्न कर रहा है,उससे कितने शत्रुओं कट कर मर रहे हैं।

विद्यापति जी कहते हैं कि माता जो कि अपने सुपात्रों पर कृपा प्रदान  करने वाली हैं उन्हें धन,बल,यश,कृति चारों पुरूषार्थों को प्रदान करने वाली हैं।माता अपने सेवा करने वालों को विद्या,बुद्धि,प्रखर,प्रज्ञा को आशीर्वाद के रूप में देते हैं।जिस कारण उनके भक्त जन की शौर्य गाथा दिग-दिगंत में  सुगंध की तरह फैलता है। इस प्रकार माता के शरण में आने वाले भक्त गण अपने जीवन में लौकिक तथा अलौकिक ऐश्वर्यो का लाभ प्राप्त करते हैं एवं मृत्योपरांत वैकुण्ठ धाम का सुख प्राप्त करते हैं।


आलेख साभार-श्री विमल कुमार "विनोद"

प्रभारी प्रधानाध्यापक राज्य संपोषित उच्च विद्यालय पंजवारा, बांका(बिहार)।

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