'अलविदा' एक अरबी शब्द है। यों तो इसका शाब्दिक अर्थ होता है - विदाई या विदा होते समय कहा जाने वाला शब्द। संस्कृत में इसे अनुमतगति: या प्रस्थानम् कहा जाता है। एक बात दीगर है कि विदा और अलविदा दो भिन्न-भिन्न शब्द हैं। विदा का अर्थ किसी से कुछ समय के लिए दूर रहना है जबकि अलविदा का अर्थ सदा के लिए किसी से दूर रहना। इसे एक उदाहरण द्वारा समझा जा सकता है -
ब्राजील के महान फुटबॉल खिलाड़ी पेले ने दुनिया को अलविदा कहा। यानि देश को फुटबॉल के मानचित्र पर एक नई पहचान दिलाने वाले, खुद को फुटबॉल का बीथोवन कहे जाने वाले पेले अब नहीं रहे। अर्थात् अलविदा फुटबॉल किंग। कहने का तात्पर्य है कि वह एक महान् गाथा छोड़कर विदा हुए और दुनिया से अलविदा। वाकई अलविदा एक व्यापक शब्द है। इसे कहने से हम अपने अंतर्मन की भावनाओं को शब्दों में ढाल सकते हैं, नवीन आकार प्रदान कर सकते हैं तथा अपनी पसंद को संहिताबद्ध कर सकते हैं। साथ ही साथ समय की अलग-अलग अवधियों को एक ढाँचा प्रदान कर सकते हैं। जब हम जीवन के अगले चरणों में जाते हैं तो अलविदा हमें बंद होने की अनुभूति कराती है। जब एक सच्चा व अच्छा मित्र अलविदा कहें बिना चला जाता है तो हम सोच सकते हैं कि क्या उन्होंने सच में कभी हमारी परवाह की और यह निष्कर्ष निकाला कि यह एक सच्चा रिश्ता नहीं था। अब आएँ हम थोड़ी व्याख्या अलविदा,२०२२ पर करते हैं।
अलविदा, २०२२ यानि वर्ष २०२२ को सदा के लिए विदा करना।
अब पुनः यह वर्ष वापस नहीं आएगा। अतः इस वर्ष की उपलब्धियों व खामियों को निम्नलिखित शीर्षकों के अंतर्गत रखा जा सकता है।
* सबसे पहले हमारे देश ने अनेक ख्यातिलब्ध कलाकारों, गायकों व ऊर्जावान व्यक्तित्व को खोया। जैसे - स्वर कोकिला लता मंगेशकर, पंडित बिरजू महाराज, बप्पी लहरी, राजू श्रीवास्तव व राहुल बजाज इत्यादि
* उपलब्धियों के तौर पर देखा जाए तो हमारा देश भारत दुनिया की ५ वीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बना।
* २० सबसे ताकतवर देशों के संगठन जी-२० की अध्यक्षता करने का सुअवसर प्राप्त हुआ।
* १८ नवम्बर,२०२२ को इसरो (ISRO) ने देश का प्रथम प्राइवेट राकेट विक्रम-एस लांच किया।
* भारत को UNSC यानि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् की अध्यक्षता मिली।
हमें २०२२ वर्ष को अलविदा कहने के पहले अपने भीतर व्याप्त बुराईयों को भी अलविदा कह देना चाहिए। जैसे- हम एक दूसरे की उन्नति को देखकर ईर्ष्या करते हैं, जलते हैं। हम एक दूसरे से वैर भाव व पुरानी कटुता को पाले रखते हैं। ऐसा हमें परित्याग कर देना चाहिए तथा परोपकार, उदारता, सहिष्णुता, प्रेम जैसे उद्दात गुणों व मानवीय मूल्यों को अपनाना चाहिए। हमारे मन में 'वसुधैव कुटुम्बकम्' की भावना होनी चाहिए। छात्रों को अपने जीवन में ईमानदार, अनुशासित व अपने कार्य के प्रति सतत् क्रियाशील होना चाहिए। अपने गुरुजनों का सम्मान करना चाहिए। यदि ऐसी सकारात्मक सोच व भावना मन मस्तिष्क में घर कर गई तो हमारा देश पुनः 'सोने की चिड़िया' हो जाएगा। अतः हम कल नहीं आज से ही संकल्प लें कि हम निश्छल, ईमानदार व निष्ठावान होकर अपने कार्य को आगे बढ़ाएँगे और कदम से कदम मिलाकर उन्नति के उच्च शिखर तक भारत को पहुँचाने का दिव्य संदेश फैलाएँगे। अलविदा हम वर्ष को करें, अपने कर्म को नहीं।
देव कांत मिश्र 'दिव्य'
मध्य विद्यालय धवलपुरा, सुलतानगंज, भागलपुर, बिहार

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