परिस्थति-रोजगार सृजित करती है- श्री विमल कुमार "विनोद" - Teachers of Bihar

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Saturday, 14 January 2023

परिस्थति-रोजगार सृजित करती है- श्री विमल कुमार "विनोद"

मनुष्य को जिन्दगी जीने के लिये भोजन,वस्त्र तथाआवास की आवश्यकता होती है।साथ ही इस संसार में उपलब्ध वस्तु को प्राप्त करने के लिये धन,संपत्ति,रूपये की जरूरत होती है और अर्थ यानि रूपये प्राप्त करने के लिये रोजी-रोजगार करने की आवश्यकता होती है।विश्व में बहुत सारी समस्यायें हैं तथा प्रत्येक समस्या अपने आप में एक समाधान है।    

  मेरा यह आलेख"परिस्थिति  रोजगार सृजित करती है",समाज के वैसे लोगों के लिये एक संदेश हैं, जो अपने को बेरोजगार कहते हैं----समाज में ऐसा देखा जाता है कि लोग पढ़-लिखकर यों ही अपने को बेरोजगार महसूस करते हैं ,उसके मूल में व्यक्तिगत रूप से किसी चीज की कमी की समस्या का हावी नहीं हो जाना है।किसी भी व्यक्ति के जीवन में जब कष्टदायक समस्या जो कि  उसके जीवन की परेशानी का मुख्य कारण होती है,होना आवश्यक है।जब किसी भी व्यक्ति पर समस्या उत्पन्न होती है तो वह समाधान खोजने के प्रयास करता है। इसे समझाने के  लिये उदाहरण स्वरूप हम प्रस्तुत करते हुये कह सकते हैं कि एक परिवार है जिसके घर में काम करने वाले मजदूर जो कि नित्य उनके घर तथा गाय की सेवा करते थे। लेकिन दुर्भाग्य की बात है कि वह काम करने वाला बीच-बीच में काम छोड़ देने की धमकी देता था तथा वह अचानक उस परिवार के साथ सौदेबाजी करता था तथा अचानक काम करना छोड़ दिया।इसके द्वारा किये गये सौदेबाजी से उब कर उस परिवार ने अचानक उपजी हुई परिस्थितियों को एक चुनौती के रूप में स्वीकार कर लिया तथा गृहस्थी से संबंधित सारे कार्यों को अपने से करने लगी।सुबह उठकर गृह कार्य करने से पहले गाय को निकालकर, उसको कुट्टी-पानी देकर अपने उत्कृष्ट कार्य का निर्वहन करती है, जिसे परिस्थिति से उत्पन्न कार्य या रोजगार कह सकते हैं।

मुझे ऐसा लगता है कि बच्चों को सीखने-सीखाने के समय ही उसमें कौशल का विकास कराना चाहिये ताकि उसके अंदर काम करने तथा रोजगार करने की क्षमता का विकास हो सके तथा उस तरफ अभिप्रेरित हो सके। इसी संदर्भ में मुझे लगता है कि सरकार के द्वारा गरीबी रेखा के नीचे रहने वालों को जो एक रूपया किलो चावल या अन्य जीवन रक्षक चीजें दी जाती हैं, यह उनको रोजगार उपलब्ध कराने का विकल्प नहीं है ,बल्कि इससे बेरोजगारी बढ़ती है।सरकार के द्वारा यदि इससे अलग हटकर लोगों में कौशल का विकास कराकर कुछ रोजगार उपलब्ध कराने का प्रयास किया जाय,तो लगता है कि यह राष्ट्र हित में लाभकारी होगा।मुझे ऐसा लगता है कि "प्रदान" जैसी संस्थाओं के द्वारा महिला संगठनों के विकास के लिये जो कार्यक्रम चलाये जा रहे हैं,सरजमीं पर रोजगार के अवसर उपलब्ध कराने में सफलता से दूर नजर आ रहे हैं।यदि किसी महिला समूह की दीदी जी के द्वारा किसी लघु उद्योग को विकसित करने का प्रयास किया गया तो वह उसमें,निजी रूप से रोजगार सृजित करने का प्रयास है।

    आज के समय में निम्नवर्गीय परिवार के लोगों को किसी भी प्रकार का रोजी-रोजगार करने के  परेशानी नहीं होती है तथा वह किसी भी प्रकार का रोजगार करने के लिय तैयार हो जाते हैं,दुर्भाग्य तो सिर्फ मध्यम तथा उच्च वर्गीय परिवारों के लिये समस्या उत्पन्न हो जाती है,जिसमें  रईसजादा बाप-माँ तथा उँचे खानदान के होने की बात नजर आती है।

अंत में,हम कह सकते हैं कि बच्चों को प्यार जरूर कीजिए, लेकिन अंधा प्यार नहीं।उसके अंदर रोजी-रोजगार करने की ललक जगाने का प्रयास कीजिए। वैसे लोग जो कि अर्जित करने की उम्र में भी बेरोजगारों की तरह खेलकूद कर अविभावकों के बैसाखी के सहारे जीवन जी रहे हैं,उसमें कुछ कमी होने की समस्या को जन्म लेने दीजिये, तभी वह रोजी-रोजगार करने की बात सोचेगा।इस प्रकार मुझे ऐसा लगता है कि जब किसी भी व्यक्ति  के जीवन में समस्या उत्पन्न होगी तभी वह काम करने केलिये बाध्य होगा।किसी शायर ने ठीक ही कहा है-

 तकदीर के खेल से,

नाराज नहीं होते

जिन्दगी में कभी

उदास नहीं होते

हाथों की लकीरों पे

यकीन मत करना

तकदीर तो उनकी भी होती है

जिनके हाथ नहीं होते।


आलेख साभार-श्री विमल कुमार "विनोद"शिक्षाविद।

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