एक शिक्षक की कहानी: साहस और संवेदना - Teachers of Bihar

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Saturday, 15 March 2025

एक शिक्षक की कहानी: साहस और संवेदना

आज से लगभग बीस वर्ष पहले की बात है। शिक्षक की नौकरी में प्रतिदिन आने-जाने का साधन रेलगाड़ी हुआ करती थी। पटना के फतुहा अंचल में हमारी नियुक्ति हुई थी, और हम शिक्षक साथी रोज़ की भाँति स्टेशन पर एकत्र होते, ट्रेन पकड़ने के लिए। यह क्रम हमारी दिनचर्या का अभिन्न अंग बन चुका था।


उस दिन भी हम सभी स्टेशन पर समय से पहुँचे थे। बृजेश जी, मेरे प्रिय सहकर्मी, मेरे साथ थे और हम दोनों वार्तालाप में लीन थे। प्लेटफार्म पर रोज़ की तरह हलचल थी, लोग ट्रेन के इंतजार में खड़े थे। कुछ ही क्षणों में ट्रेन स्टेशन पर धीमी गति से प्रवेश करने लगी। तभी एक अप्रत्याशित दृश्य ने हमें चौंका दिया—एक विद्यार्थी ट्रेन की बोगी से उतरने की कोशिश में घबरा गया और संतुलन खो बैठा।


अचानक हुई इस घटना को देखकर बृजेश जी तुरंत दौड़ पड़े। मैं भी उनके पीछे-पीछे लपका। उस बच्चे को बचाने की कोशिश में हम दोनों अपनी जान जोखिम में डाल चुके थे। ट्रेन धीरे-धीरे प्लेटफार्म पर प्रवेश कर रही थी, लेकिन उसका वेग अभी भी खतरनाक था। विद्यार्थी की टांग प्लेटफार्म और ट्रेन के पायदान के बीच फँसने ही वाली थी कि हमने उसे पकड़ लिया। मगर इस प्रयास में हम दोनों भी घिसटते चले गए। घबराहट के बावजूद, हमारी एकमात्र चिंता उस मासूम को बचाने की थी।


संयोगवश, प्लेटफार्म पर मौजूद रेल मजिस्ट्रेट, टीटी और जीआरपी पुलिसकर्मी इस घटनाक्रम को देख रहे थे। उन्होंने भी तत्काल सहायता की और बच्चे को सुरक्षित बाहर निकालने में हमारा सहयोग किया। अंततः हम सबने मिलकर उस छात्र को सुरक्षित उसके गंतव्य तक पहुँचाने की व्यवस्था की। हालाँकि इस अप्रत्याशित घटना के कारण हमारी ड्यूटी बाधित हो गई, परंतु हममें से किसी को भी इस बात का कोई मलाल नहीं था। स्कूल प्रशासन को सूचना देकर हम घर लौट आए।


यह घटना आज भी मेरे स्मृतिपटल पर अंकित है। जब भी इसे याद करता हूँ, तो पूरे शरीर में सिहरन सी दौड़ जाती है। यह एक ऐसा अनुभव था, जिसने न केवल मेरे भीतर की मानवीय संवेदना को गहराई से छुआ, बल्कि यह भी सिखाया कि कठिन परिस्थितियों में तत्परता और साहस ही जीवन बचाने का सबसे बड़ा मंत्र होता है।


सुरेश कुमार गौरव, प्रधानाध्यापक, उ.म.वि.रसलपुर, फतुहा, पटना (बिहार)


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