भारत में समय गणना की कई प्रणालियाँ प्रचलित रही हैं, जिनमें विक्रम संवत प्रमुख है। यह संवत भारतीय संस्कृति, इतिहास और ज्योतिषीय परंपराओं से गहराई से जुड़ा हुआ है। विक्रम संवत न केवल हिन्दू पंचांग का आधार है, बल्कि यह सामाजिक और धार्मिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।
विक्रम संवत की उत्पत्ति:
विक्रम संवत की शुरुआत ईसा पूर्व ५७ वर्ष में हुई थी। इसके प्रवर्तक चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य माने जाते हैं, जिन्होंने उज्जयिनी (वर्तमान उज्जैन, मध्य प्रदेश) से शासन किया था। इस संवत को प्रारंभ करने के पीछे एक ऐतिहासिक घटना जुड़ी हुई है—
शकों पर विजय और विक्रम संवत की स्थापना:
ईसा पूर्व पहली शताब्दी में भारत के पश्चिमी और उत्तर-पश्चिमी भागों में विदेशी आक्रमणकारियों, विशेष रूप से शक जाति, का आतंक बढ़ गया था। इन शकों ने उज्जयिनी सहित कई महत्वपूर्ण नगरों पर अधिकार कर लिया था।
सम्राट विक्रमादित्य ने एक शक्तिशाली सेना संगठित कर शकों को पराजित किया और पुनः भारतीय संस्कृति व परंपराओं को पुनर्जीवित किया। इसी विजय की स्मृति में उन्होंने विक्रम संवत की स्थापना की, जो ईसा पूर्व ५७ वर्ष से आरंभ होता है।
विक्रम संवत का स्वरूप:
1. चंद्र-सौर पंचांग:
विक्रम संवत एक चंद्र-सौर पंचांग पर आधारित है, जिसमें चंद्र मास और सौर वर्ष का समन्वय किया जाता है।
इसमें वर्ष १२ चंद्र मासों का होता है, और हर ३ वर्ष में एक अधिक मास जोड़ा जाता है, जिससे सौर और चंद्र वर्षों में संतुलन बना रहे।
2. माहों की गणना:
विक्रम संवत के महीनों के नाम हिन्दू पंचांग के अनुसार होते हैं, जिसके नाम इस प्रकार से हैं -चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ, आषाढ़, श्रावण, भाद्रपद, अश्विन, कार्तिक, मार्गशीर्ष, पौष, माघ और फाल्गुन।
वर्ष का पहला महीना चैत्र होता है और नया वर्ष चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को आरंभ होता है।
3. दो भागों में विभाजन:
आईए इस विक्रम संवत के उत्तरायण और दक्षिणायन दो भागों की चर्चा करते हैं।इसके वर्ष दो भागों में विभाजित होते हैं—
उत्तरायण (मकर संक्रांति से कर्क संक्रांति तक)
दक्षिणायन (कर्क संक्रांति से मकर संक्रांति तक)
विक्रम संवत का महत्व :
1. धार्मिक और सांस्कृतिक महत्ता:
विक्रम संवत भारतीय समाज में अनेक धार्मिक आयोजनों और पर्व-त्योहारों विवाह समारोह,शुभ मुहूर्त आदि आयोजनों का आधार है।
दीपावली के अगले दिन से गुजराती नववर्ष का प्रारंभ होता है।
चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को नव संवत्सर के रूप में मनाया जाता है, जिसे हिन्दू नववर्ष भी कहा जाता है।
2. राष्ट्रीय और ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य:
भारत में स्वतंत्रता से पूर्व विक्रम संवत ही राजकीय संवत के रूप में प्रचलित था।
हमारे पड़ोसी देश नेपाल ने इसे अपना आधिकारिक संवत वर्ष माना है और वहाँ आज भी विक्रम संवत का प्रयोग किया जाता है।
3. ज्योतिष और पंचांग में उपयोग:
भारत में पंचांग निर्माण और शुभ मुहूर्त निर्धारण के लिए विक्रम संवत का उपयोग किया जाता है।
विवाह, यज्ञ, गृह प्रवेश, नामकरण आदि संस्कार इसी संवत के आधार पर तय किए जाते हैं।
निष्कर्ष : विक्रम संवत भारतीय परंपरा, संस्कृति और इतिहास का महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह केवल एक तिथि गणना प्रणाली नहीं, बल्कि भारत की विजयगाथा, गौरवशाली अतीत और सनातन संस्कृति का प्रतीक है।
आज भी, जब आधुनिक ग्रेगोरियन कैलेंडर का उपयोग प्रचलित हो चुका है, तब भी धार्मिक, सांस्कृतिक और पारंपरिक आयोजनों में विक्रम संवत का विशेष स्थान है। यह भारत की प्राचीन कालगणना पद्धति की वैज्ञानिकता और गौरव को दर्शाता है, जो हजारों वर्षों से निरंतर प्रचलित है।
"समय के चक्र में परिवर्तन आता रहेगा, परंतु विक्रम संवत की गाथा युगों-युगों तक भारतीय संस्कृति में जीवंत बनी रहेगी!"
सुरेश कुमार गौरव, प्रधानाध्यापक, उ.म.वि.रसलपुर, फतुहा, पटना (बिहार)
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